अवघर बड़े, दानी, दयालु
भावभूमि: सावन का पहला सोमवार है, शिवालय ही नहीं सारे देवालय प्रातः से ही आस्था पुंज बने साक्षात मुखरित हैं। प्रसन्नता मंदिर जाते सभी चेहरों पर खेल रही है, शिव से कुछ पा लेने की महत इच्छा पुरार्णव भक्तों में, एक सी लहर रही है। गोदुग्ध, गंगाजल, विशुद्ध जल, घृत, मधु, मधुर रससिक्त रंग बिरंगे नवलपुष्प, अक्षत, दुर्वादल, बेलपत्र, और न जाने क्या क्या थाल में रख आवरण उरा तरंग में, कामनाएं मनों में, मुंह से शिवमंत्र उच्चारते भीड़ उमड़ आई है। नजारा अद्भुत है। कुछ लाइने इसी पर आपके लिए।
कोई! देवता क्या.. अनूठा... है!
पास में...,
मंदिर.. है जिसका..
भीड़.. सारी, कहां.. पर, सब
ऐसी सजधज,
गाते बजाते जा.. रही है?
थाल.. भर भर, देव कन्याएं
ये... प्रातः
किस... देवता को,
सावनी सोमवार, चुनकर...
दिन निकलते,
प्रात में, सुखगात.. होकर
प्रसन्न.. बदना, थाल में
बिल्वपात भर.. भर..
उछलती...,
तन्मयी हो, पूजने
किस देवता को, जा रहीं हैं।
दीखता मुझको नहीं है,
शिखर ऊंचा
एक भी,
उपत्यिकाओं की लड़ी...
बिखरी.. हुई यह दूर.. तक,
निर्जन.. बहुत है, क्षेत्र यह...
प्राचीन हैं, सब
प्राचीन सारी यहां की वनितावली है।
शांति कैसी देवपुर सी, घूमती है
हरीतिमा चादर चढ़ाए
अंग.. हर
हर ओर.. सुंदर दीखती है।
शीतल रचित,
इन दृढ़.. मगों पर,
देव कन्याओं की पांतीं,
नवबधू, के संग सँघाती
टूटती ही है नहीं रे!
कौन हैं? वह देव हैं,
तो.. सुन...
आदिदेव,आशुतोष,
अवघर बड़े, दानी, दयालु
देवो के देव महादेव,
देवाधिदेव, अजन्मा, सौम्यपरा,
चंद्रमौली
पार्वतीनाथ, महाशिव, भोलेनाथ
पूछता है कौन देव...
उन देव को ही पूजने
ये भीड़ सारी जा रही है।
असारी, संसारी के
सारी विसारी शिव,
सारी.. के संसारी,
असारी के सारीशिव
सारी असारी शिव,
शिव भक्तों के अकामी शिव
कामी शिव, भक्तों के सकामी शिव
पूजन को भीड़
ये सारी ही जा रही है।
पग दो: दुनियां ये बेरंगी
भाव: वर्षा रितु है, प्रिय.. विछोह कालिदास के यक्ष को इसी ऋतु में हुआ था तो मेघदूत कालजयी काव्य अस्तित्व में आया। रात्रि में गरजते बादल और बदलियों का खेल फिर शुरू हो गया है, गगन गिरा घहरानी की आवाजे आने लगी हैं । इन उमड़ आई बदलियों और सशक्त बादलों के परस्पर प्रेम से हो रही जल वर्षा, हमे किशोर वय की पुरास्मृति में भेज देती है। बूंदों की आवक अश्वसेना की आवक सी नजदीक आती आवाजें, चिर यादें ताजा कर जाती हैं। बरखा की वो महक नाक में पुनर्नवा सी बस जाती हैं। बहुत कम लाइने इसी संदर्भ में आप के लिए।
दिन छोटे हो जाते कैसे,
रातें... लंबी लंबी
मीत बिना, जग सूना...
कितना..!
प्रिय!
लंबी... रतियां.. मो..री..।
चांद! मुझे.. तुम प्रिय थे,
कितने..,
साथ.. दिया करते थे,
पूरी... रात, चमकते.. थे तुम!
बातें...
हम, करते.. थे,
बातें... कितनी, चलती... रहतीं,
रात.., निपट.. जाती थी,
बात नहीं अंटती थीं,
मेरी..
भोर... हुई, आती.. थी।
रात थी, कितनी छोटी..
उन दिन
दिन.., पहाड़.. जैसे थे,
आज! उलट कर देख रहा हूँ
स्मृतियां, जीवन.. की।
उलट.. गई हर बात,
तेरे बिन
जग.. हारा, तेरे... बिन।
आज समझ में आया अच्छे
जीवन क्या? तेरे बिन!
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment