वो चांद ले के आएगा, इसका मुझे विश्वास था
भाव: ये जीवन आशाओं, उम्मीदों, सुंदर कल्पनाओं और महत्वाकांक्षाओं का एक संजीदा संकुल है। कुछ पूरी होती हैं, कुछ पूरी होने की उम्मीद में विश्वास डोर से बंधी जीवन भर अधूरी पर जीवित रह जाती हैं। इसके विपरीत जीवन का दूसरा पहलू निराशा, अवसाद, सोच, चिंता भी होता है। लेकिन इन दुःविचार से अच्छा, उम्मीद में, पराविश्वास में जीना, ज्यादा अच्छा होगा, ऐसा मेरा मानना है। जैसे बेटा नालायक तो अजन्मे पौत्र से उम्मीद, यही तो हमे प्राण और ऊर्जा दे सकते हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
वो.., चांद.. ले के...,
आएगा,
इसका.., मुझे.. विश्वास.. था,
छोटी... हैं, मेरी.. ख्वाहिशें...
उसको.., भी..., ऐतबार था।
भाव: जीवन आशा है उमंग है, सुंदर क्षणों को बुने, कल्पना के पुष्प से इसे सजाए। सदा उम्मीद से रहे। चीजें बड़ी नहीं होती, हालात और पक्का ईमान व विश्वास इसे पूरा करते हैं।
खुश... रहे, हम अरसे तक
बस.., इसी.. खयाल... में
चांद.., चांद..., ही.., रहा..
मेरी, ख्वाहिशें..बनी.. रहीं।
भाव: जीवन में जो मिला उसमें संतोष, लेकिन उम्मीद न छूटे, आनंद सोच से पैदा होता है भोग से नष्ट होता है। कल्पना की अल्पना सुंदर ही होगी। उद्देश्य ऊंचा रहे, मार्ग संयमित, प्राप्ति महत्वपूर्ण नहीं। सच्चा मार्ग ही आनंद है। शिखर पर, विजय के बाद शून्य ही बचता है।
ये.. जिंदगी, है और क्या..?
ये.. ख्वाहिशें, अगर.. न हों!
जिया.., हजार.. साल, जो
वो..., जिंदगी से, दूर.. था।
भाव: महत्वाकांक्षा ही जीवन रस है, ऊंची पेंगों में जीवन है, उल्लास है, बहुत लंबा जीवन और चारपाई पर पड़ा रहे जीवन नहीं।
झूलती.. है, जिंदगी...,
शिखर.. शिखर..., अरे.. नहीं!
हर शिखर के बीच.., एक
न्यून....तम, सदा.. रहा।
भाव: जीवन में उतार चढ़ाव आएंगे, इन्हीं से जीवन पनपता है, रसता है। लयताल, परिवर्तन न हो तो जीवन में आनंद नहीं जड़ता है। इसलिए ऊंची उड़ान से उतर भूमि पर लोक जीवन जीने में आनंद है।
झूलता... है, झूलना...,
वो.. कौन है, ये..देखना!
ख्वाहिशें हैं झूलती,
या मन... है उसका, झूलता।
किसने.. कहा, "वो".. झूलता?
इसलिए मैं कह रहा हूं
जिंदगी बटोर.. लो!
ख्वाहिशें.. सदा रखो,
न.. ख्वाइशों से दूर.. हो।
मर गईं जो ख्वाहिशें
तो...
जिंदगी भी मर गईं!
इसलिए तो कह रहा हूं
ख्वाहिशें... सदा रखो।
भाव: सारे सुख और सारी संप्राप्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो पाएंगे कि सबकुछ बस पूर्ण होने के पहले की स्थिति में जितना प्रिय था मिलने के बाद उतना नहीं रह जाता। जैसे प्रिया के पत्नी बनने पर स्थितिप्रज्ञ हो देखें। वास्तव में ललक या चाहत इसी को लस्ट कहें, ललचाती है, मन को उछाल देती है लेकिन इस उछाल में ही जीवन है। नहीं तो आदमी जिंदा ही मुर्दा हो जाएगा। पर शांति जरूर रखे और इनको गहराई से तत्वतः समझे।
वो भी एक चित्र था,
रास्तों.. में मिल गया
ये भी एक चित्र है
ख्वाइशों के संग बना,
कल्पना में बह रहा
सोचता हूँ बैठ कर
जिंदगी के रास्तों पे
क्या कोई... अपना मिला?
भाव: सच में जीवन न तो उत्साह का कुआं है न ही सौंदर्य का खेल, न ही दुनियावी चीजें इसमें केवल और केवल अधिक से अधिक एक हृदय से निर्मल, ईमानदार, दयालु, स्वस्थ अपने पक्के साथी की दरकार है। इससे ज्यादा रंग और रंगत ही हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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