एक बच्चा.., बहुत छोटा.. चाहिए

परिवेशन: इन विकसित देशों में जहां जीने की सारी सुविधाएं है, समुचित आजादी है, उन्नत हवा पानी और माहौल उपलब्ध हैं। साथ ही आबादी कम होने से हर हाथ को काम है, आम-मजदूरी और तनख्वाहों में ज्यादा अंतर भी नहीं है। सभी को  रियायती रेंट पर सरकार घर देती है। सभी बच्चों की पढ़ाई फ्री, पूरे परिवार की दवाई फ्री, हर बच्चे के पालन हेतु पैदा होते ही पच्चीस हजार महीना बच्चे चाहे कितने हों। अठारह वर्ष की आयु तक अनवरत हर बच्चे को सुनिश्चित। अड़सठ साल पर हर वृद्ध की अच्छी खासी पेंशन। सब हाजिर तब भी कुछ विकृत मस्तिष्क के लोग यहां होते हैं। जो दिखाई नहीं देंगे। अच्छे घरों में रहते है पर अन्यान्य कारण से आत्मग्लानि, या विश्व की चिंताओं से अवसाद ग्रस्त हैं। और हर उपलब्ध जगह पर अपने अन्तर्भाव अंकित करते रहते हैं। उन्हीं को समर्पित ये पंक्तियां। आप आनंद मात्र के लिए ही पढ़े कदापि चिंतित न हों। उनकी फ्रस्टेसन की एक कलाकृति के लिए अंत में लिंक दिया है आप देख भी सकते हैं।

एक बच्चा.., बहुत छोटा..

चाहिए, 

जो..,  हो, हमेशा.., 

अपने भीतर.., मस्त.. बिल्कुल, 

ठिठुल करता, मुक्त... हंसता, 

सांसारिक.. दबाओं से।


या... रहें हम, साथ, 

प्रिय.. अभिभावकों... के, 

ता-उम्र.. तक

जो, फेर दें, निज.. हाथ, 

सिर पर.., प्यार ले, आशीष के।

भाव: आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक विश्व में या तो आप एक बच्चे की सहजता को अपने भीतर बनाए रखें या आपका परिवार सुखद और ब्लिसफुल हो जहां तनाव से मुक्ति मिल जाए नहीं तो जिंदगी नर्क ही हैं।

जिंदगी.. स्नान... कर ले,

मुक्त.. कर दे, 

हर.. हराती.. सोच से 

हमे.., दूर... कर दे,

हर विकृति से, अलग रखे, 

रिफ्रेश... सी कर दे।

भाव: जिससे आप की सुबह आशा के पुष्प पर आगे चले आप ऊर्जावान बने रहें।

कुछ.. तो होगा, 

सबसे, अलग..! इस तरह..के

क्यों.. हैं, वो...

इंटेलेक्चुअल हैं, सेंसिबुल हैं, 

प्रतिष्ठित हैं..

धन.., धरा.. से,  विभूषित.. हैं,

क्या.. सोचते हैं? सोचता.. हूं! 

दिल.. लगा के! बुद्धि.. से..

शक्ति मेरी, सोच.. मेरी, 

उन तक नहीं है : 

तोड़ती सीमा... हैं वे, 

हर "अग्रेशन" विक्षोभ.. की, 

मैं जानता... हूँ,

वेदना.. की, 

गल... गई, उन सीढ़ियों.. पर 

सबसे ऊपर! बैठे... हैं वे...।

भाव: आज अनेक अच्छे पढ़े लिखे लोग व्यभिचार, शराब सेवन और अन्यान्य बेवकूफी भरे आचरण में डूबे हैं क्यों! कोई कारण तो होगा ही। जो अवसाद और स्वयं को भी पीड़ित कर दुख पा रहे हैं। 

सेंस... से,   बे-सेंस... होकर 

परा-स्थिति... से, गुजर.. कर,

अंगार.. की, तपती.. हुई 

हंकार के, वे... गणपती... हैं।

भाव: ऐसे लोग आम आदमी नहीं, परम विवेकवान हैं, फिर भी रोज गम गलत करने, स्थिति से भागने के लिए नशे को अपनाते रहते हैं। दुख की अंतिम सीढ़ी पर बैठ कष्ट पाते और अलग दुनियां की तलाश में लगे रहते हैं।

एंगर*.. की, परीक्षा.. को, पार..  कर

भस्म.. की, सीमा हैं वो...

गहन सीमा..., बुद्धि.. की, 

विश्लेषणों... की

कर सके, कोई यहां, इस.. विश्व में

पार... हैं, हर बुद्धि के वो..

आत्मस्थ है, विचारों में, 

खुद ही में वे।

भाव: अपने भीतर क्रोध से जले, पश्चाताप में भुने, तर्क से भरे, ये लोग अंतर्मुखी हो, हर सीमा से परे, स्वयं में ही जीवन जीते हैं। हमसे आपसे सर्वथा विलक्षण बुद्धिवान हैं।

उनकी.. जगह, 

कहीं.. भी, इस विश्व... में

है.. ही.. नहीं! 

उनका विधाता, नाम लेवा, 

आगे पीछे..अरे! कोई 

है..., ही.. नहीं? 

खुद...ही हैं, साक्षात! वे..,  

अपनी..., कृति...।

भाव: ऐसे लोगों को लगता है पूरा जग पराया है। एक एकांत की या अपने में ही, अपनी परिधि से घिरे ये लोग जीवन जीते हैं।

"लिखी"...तो 

उसे.. मत.. कहो...!

उभरी... कहो! 

क्या चाहते हैं बताना.., 

उकेरना.., उदघोष.. करना!  

हर दिवालों पर, पुलों पर, 

बिल्डिंगों पर, सड़क ऊपर, 

फुटपाथ पर, 

बसों पर ट्रेन ऊपर, शेष बाकी

यहां.. बर्लिन... वाल पर! 

भाव: इनके संकेत, पहनावा, जीवन दृष्टि, लिखावट, और सबकुछ आम जन से अलग होते हैं। यहां पश्चिम में ऐसे लोग हर जगह बड़े बड़े अक्षरों में दिन भर क्या लिखते है, लिखे हैं आप नहीं पढ़ सकते।

कोई जगह खाली... नहीं है, 

खाली... जगह पर, ही... 

लिखें... वे.., 

ऐसा... नहीं है।

जगह जो उन्हें मिल गई, 

जहां पर, 

जिस हाल में...

सोच.. से, ऊपर समझ, रसा...तल, 

धरा...तल पर! पार... पथ पर!

बोलती.., कहती.. हुई, पिसती.. हुई, 

दबती.. हुई, चीखती..., 

चीख, हो कोई..., निकलती

पुकारती, फुफकारती... आवाज देती, 

विनती.. करती

धौंस देती, डराती.., हहकारती...

विप्लवी, सी..

कह नहीं सकता हूं मैं!  हर बात सच! 

उनके, मन हृदय की....। 

भाव: इनके मन के भाव इनकी अपनी सांकेतिक भाषा में हर जगह लिखी हुई आप को यहां बर्लिन में मिलेगी। उसमें जीवन के सारे भाव और तथ्य आप को खोजने पर पूरे दुनियां के मिलेंगे। उनका जीवन, विचार, अनुभूतियां, और सिस्टम सब अपेक्षित से पराभूत विलक्षण है।

हर ओर.., फैली 

एक सी, 

एक छोर से उस छोर तक,

कहती... हुई, अपील... करती, 

डरती... हुई

अपने में मिलती ...

डूबती अवसाद में

तृष्ण होती, 

मधुर भी, कभी आवारापने सी।

भाव: अजीबोगरीब, ऊहापोह भरी जिंदगी, कभी शर सी तेज कभी खर सी छोटी, कभी शशक सी उछाल लेती कभी कच्छप सी धीमी, क्या क्या समोए है क्या कहें। अविगत गति... है।

पर कौन है 

वह... ! 

आज तक दिखता नहीं है, 

एक... भी,

हां खड़ा... है हर ओर.. 

अपने हाथ लेकर..।

भाव: ये लोग कौन हैं, अलग नहीं, हम आप जैसे ही हैं पर इनके निशान इनके करतब आपको हर जगह मिल जाएंगे।

इलाका.. यदि उन सभी का 

कोइ, हो... अलग! 

मैं.. मिल भी आऊं, एक दिन! 

सच! चाहता हूं!  

खोजता उन्हें!  किधर जाऊं 

एक भी मिलता नहीं है।

वो... हम ही हैं, हममें... ही है, 

संवेदना.. की पराकाष्ठा 

सत्य में...बहती हुई...।

जब निकलती है.. छप है जाती 

दीवालों पर, सड़क पर, हर जगह..

सरफेसों पर, 

अनुकृति बनाती हुई..

आकृति...और अक्षरों को 

एक में, करती... हुई। 

अलग ही अपठनीय बन, 

भाषा कोई..!  

भाव: इन लोगों को सोचकर लगता है ये संवेदनाओं के मानक प्रतिरूप हैं बिना वस्त्र के बिल्कुल नग्न, निर नैसर्गिक, इन्हें हमारी, सभ्यता और संस्कृति और हम पढ़ पाने और समझने में समर्थ नहीं हैं।

अवसाद की, मुक्ति की, 

बंधनों की, 

उलाहने की, धौंस की, बुद्धि की 

या मौन की।

भाव: इनकी भाषा या तो आत्मपीड़ा की है या मजबूरी, असमर्थता की है, या उलाहना की है जो हमारी व्यवस्था से या बुद्धि से परे है। यह शायद पराकाष्ठा हो अथवा मौन हो सकती हैl

जय प्रकाश मिश्र



Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!