"पर" खुले हैं आज उसके मात्र उड़ने के लिए
परिदृश्य: आज बाहर जो छटा, परिणय पश्चात नवेली बहुओं की दिख रही है वह सोच को और गहराई देती है, और बदलते परिदृश्य की ओर स्पष्ट इशारा कर रही है। यद्यपि अपनी ही बच्ची बहू बनती है, इस लिए दोष किसको दें। शायद हम और साथ ही बदलती संस्कृति, दूरदर्शन के दृश्य, कथाएं और नेट चैट, दीर्घ समय से दबाव का खुलापन आदि इसके कारण हों। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आप आनंद लें।
वह.. "नदी" है,
यह.. तो, सच.. है
पर, सुरसरी..
"वह".....
अब.. नहीं.. है।
शांत कर दे, दूसरों को,
आत्मसात कर ले.. दुर्गुणों को,
माफ कर दे, वह..
तेरे..., किन्हीं लक्षणों.. को,
ऐसी.. नहीं है।
पुरानी,
गहरी सलोनी, श्याम सी,
वह..., यमुना नहीं है..
बर्दास्त कर ले, पग पीछे रख ले!
अरे सुन!
यह.. नदी.. है, नवेली, अलग है, रे... !
एडिशन नई है..
"आज.. की..." उछलती...,
बिहरती.., मन.. मौज.. लेती...।
शुरू से ही,
वासना स्पर्श... करती
दूरदर्शन..., दूरवार्ता... उपकरण... से
मेल.. करती, अवधान ले ले देखती..,
सब समझती
इसलिए..
कम उम्र में,
किनारे, तट बंध सारे.. तोड़ती,
बहती... हुई, काल के कराल मुख सी
अपने.. मन.. की, निष्ठुर... है रे!
दोष... उसका, कहां.. है?
उसको.. दोषी, कैसे..
कह.. दूं!
बाजार.. उसको.. बनाया है...
आज किसने?
पटल पर, हर.. दृश्य... के,
नग्नता... के नाच.. में
उसको.. नचाया,
दिखाया, इतने खुले.. में..
हाय.. किसने!
बाज़ार को इस, पूंजीवाद को इस
क्या कहूं..!
लाभ की इस,
बेशरम सी चाह! को मैं क्या लिखूं?
पूछता हूं,
मां, बहन, बेटी से ज्यादा,
सम्मान उसको, मान, उसको,
दिलाया है, आज किसने?
कौन है वो.. हम ही हैं
जो, रो रहे हैं आज खुद क्यों?
दबाओं से, निकल कर..
निष्ठुरपना को
झेलकर..
लाज
को,
शर्मिंदगी को मात देकर...
आज वह...,
मुखरित... हुई है..
अधिकार ले, जाग्रत हुई है,
आम से, अधिकार ले, रण में खड़ी है..।
सोच ने, अब आज उसकी,
रस चख लिया है
वह तोड़ देगी बंध सारे,
छोड़.. देगी... रस्ते पुराने..
संस्कृति के,
वो ट्रैप है उसके लिए।
"पर" खुले हैं आज उसके..
मात्र....
उड़ने के लिए, देख रे !
रास्ता उसने चुना है, जंगलों से
उपवनो में तूं.. उसे,
मत रोक रे !
तूं चाहता.. है, वह मुक्त... हो!
और छोडे सारे रास्ते,
समतल... पटों, पर ही बहे!
कैसे ये होगा?
"विचार कोई मुक्त हो...
व्यवहार... में,
बंधनों... में ही रहे..", ये कैसे होगा?
सोच रे! ये कैसे होगा?
सोच रे! मुक्त.. बह..,
वह मुक्त ही है, हो गई रे।
जय प्रकाश मिश्र
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