बदलियां बर्लिन की क्या ये! ओरिजिनल हैं।
परिदृश्य: मित्रों हर जगह की प्रकृति, फैली जीवन संपदा, वहां की देश काल और स्थिति के कारण, रूप, रंग, व्यवहार आदि में अलग ही होते हैं। सभी सुंदर हैं और पूज्य भी। यहां, जर्मनी में, वर्तमान प्रवास काल में, अनुभूत.. आबो हवा से आप को मिला सकूं, और.. बाद में, मैं स्वयं भी इससे मिल सकूं, इस लिए ये लाइने लिखी हैं। आप पढ़ें और आनन्द लें।
इतनी सुंदर! बदलियां! आकाश में!
नटवर.. नटी..ली, नाचतीं..
पाला है, किसने..!
इन सभी को..
अपने
घर..
में!
या खुले, मैदान में!
ये खुद पली हैं
सोचता
हूं!
पर, देख... कर विश्वास.. है
इन विहंसते, लंबे, घने..
योजनों... फैले हुए इन, जंगलों.. को
बीच..में, इस मुगलसी*... झील.. को,
फैली है जो, गोद... में, ले...,
आज भी, स्मार्ट..से, बर्लिन, शहर को..
ये बदलियां, बच्चियां हैं, इन सभी की
इतनी सुंदर, जो... उड़ रहीं, आकाश में।
मदमस्त हैं, ये.. देखने... में
घेर.. लें, अपनेपने से,
प्यार से...
तो, भूल जाओ, अपना रस्ता..
ढलती... हुई, हर..
शाम.. को,
बदल.. लोगे, सपने अपने...
आंख के,
जब, पै..ठ गहरे...,
बदल देंगी.. मूड ये..।
कुछ इस तरह की बदलियां हैं, यार ये।
बस... एक ही है, कमी.. इनमें,
कायम... नहीं हैं,
देर तक..!
एक क्षण में,
बदलती हैं, घुल हैं जाती धूप में।
लो...
पट.., बदल... कर, आ.. गई, हैं. बदलियां...देख तो!
आकाश.. में, उड़ते.., उमड़ते.., भागते,
इन बादलों में, सहज.. बन कैसे खड़ी हैं,
सलिल भर, निज.. अधर में।
नयन भर कर देखतीं हैं।
ओरिजनल हैं,
देखा! है
मैंने..
पर दूर.. हूँ, मैं... खुद...., क्षितिज में।
रसीली,
नव कपोती.. सी
"भा" लिए नव, नवलिमा की..,
हल्की सरसती..., सुष्ठुतन हैं चमकतीं ।
सांवली.. ये,
इठल.. करती, एक संग,
चुलुल.. होकर, चुहुल... करतीं।
चुहिल..भी हैं, चुटिल.. भी हैं
चुटुल हैं,
ये... नव वयस की..
झुंड... में, सुकुमारियों... सी, डोलती हैं।
नीलिमा.. ले पार्श्व... में
सुंदर.. सजीली..
नीवि.. के,
कर बंध.. ढीली...
छोड़.. पट, खोल.. लट,
ये उड़ रहीं है, रात दिन...
मुक्त.. हो, इस जर्मनी की, भूमि ऊपर।
हर.. रोक से, ये मुक्त... हैं,
स्वच्छंद.. हैं, अद्भुत... नवेली..।
आकाश.. में..
निज.. अंक.. में,
समेटतीं, रवि रश्मियों को
झांक.. कर, मन... में, मेरे...
कुछ कह... रही हैं,
गगन.. में उड़ती.. हुई, ये..
उड़... चलूं,
रस.. हृदय, चख.. लूं
स्पर्श.. इनको,.. हल्का कर लूं!
मन... चाहता है!
रेशम.. की, धारी...
किनारी...
दीखती.. है, पास... इतने,
छू.. ही, लूं...,
या...चुप रहूं.. परदेश है,
बर्लिन है ये..
बहुत उन्नत देश है।
चल छोड़...
ये, बस... बदलियों का खेल.. है।
ये... बस..., बदलियों.. का, खेल.. है।
जय प्रकाश मिश्र
शब्द: अर्थ
मुगलसी*... बर्लिन की एक प्रसिद्ध, बहुत बड़ी झील
Comments
Post a Comment