कुछ कह रहा बर्लिन शहर ये, मौन रहकर !
एक्.. "उदासी" सी...,
शहर... को,
इस घेर.. कर, कबसे... खड़ी है,
देखता हूँ, महीने.. से,
ज्यादा.. हुए दिन
छंटती.. नहीं है, एक क्षण को।
एक... भी रौनक... नहीं है,
संगीत... कोई बज.. रहा हो,
सड़क.. पर,
किसी गली.. में, घरों.. में बिल्कुल नहीं है।
एक दिन...
एक खुली.. खिड़की..
रह गई थी.. फ्लैट की, किसी सामने.. ही
पर्वत! कोई हो.... रो रहा, नीचे... दबा,
कहीं नींव.. में!
इस तरह की, बहुत.. भारी...
आवाज...! उठती.., नीचे गिरती, हार कर..
थी सुनी.. "संगीत".. की।
बस.. भूल जाऊं, अगर मैं, छोड़ दूं
अलेक्जेंडर... प्लॉट्स.. को बस।
घंटियां, घड़ियाल कोई,
बज उठें
मंदिर कहीं हो, पास में संभव नहीं,
गिरिजाघरों की घंटियां, ही गूंज जाएं
कान से, मैं सुन सकूं,
इस शहर में आसां.... नहीं।
गिरिजाघरों... की बाढ़ हो..
इस देश.. में ऐसा नहीं... है
सौ... साल से भी पुराना...
एक.. कोई नया.. हो,
इस शहर में मतलब... नहीं है।
कोलाहल कहीं, कोई हो रहा हो
भीड़ हो, किसी सिनेमा की
मैं सुन सकूं, आज तक, बिल्कुल नहीं है।
अल्लाह की अजान कोई पास से
दूर... से ,... उठ रही हो,
आ रही हो..
सदाओं में, गूंजती हो,
मस्जिदों... से,
अरे! एक भी मस्जिद, यहां, दिखती.. नहीं है।
बांग दे मुल्ला कोई, सुबह ही अज़ान दे
इस शहर में, ऐसा.. नहीं है।
सड़क ऊपर, बोर्ड हो, प्रचार का..
फोटो लगी हों, किसी की... भी
एक भी दिखती नहीं.. है।
हरितिमा हर ओर फैली सघन.. है
बालू.. सनी हो भस्म.. में,
मिट्टियां... हैं, इस तरह.. की।
पाषाण हैं, नीचे दबे, छोटे बड़े,
दीखते हैं बहुत कम, बाहर.. कहीं।
पैंसंठ... प्रतिशत, नास्तिक... हैं,
शेष सारे.. आस्तिक हैं,
मिक्सड हैं, हर धर्म के,
पर प्रथमतह ये क्रिश्चियन हैं।
पर... धर्म की,
सब, एज... पर हैं, कट्टर नहीं... हैं।
बहुत कम.. कट्टर "बचे.. हैं"।
वाम.. छाया घूमती है
बादलों सी,
बिल्डिंगे खाली पड़ी हैं, चार्ली* सी
हर जगह ही।
लोग चुप! चुप! चल रहे हैं,
व्यवस्था.. में पल.. रहे हैं
सभ्य है, सादे बहुत हैं, अंतर्मुखी.. हैं
एक रंगी.. वस्त्र सबके... तन चढ़े हैं,
पैटर्न.. कोई, छीट.. कोई, चमक.. कोई
विशिष्ट हो, संभव नहीं है।
आम से सब लोग हैं, शांत से सब लोग हैं,
भाग-दौड़ी, कहीं कोई, देखने को है नहीं।
तुम नहीं मानोगे मेरी,
बाजार घूमो शौक से, शहर घूमो शौक से..
हॉर्न क्या है? क्या है होता.. हॉर्न!
छोड़ कर, बस पुलिस को,
कभी भी बजता नहीं है।
घंटियां हैं ट्राम... में,
अरे! वो भी.. फ्रांस में!
टन्न टुनटुन.. बसों में, क्रासिंग पे सुन!
पर जर्मनी में हाय! ये.. भी तो.. नहीं हैं।
दौड़ती हैं, वेग से, हर.. गाड़ियां,
ट्रेन.. सरपट.., कितनी तरह.. की
क्या.. कहूं?
सर्फेस पे सारे.. एक जैसी,
भूमिगत.. हैं अलग.. कोई
स्पीड मध्यम, स्पीड उत्तम, स्पीड अनुपम
उड़ती हुई, दिन रात, करती बात हैं...
ये हवाओं से अनवरत, हवाओं की जात हैं,
ट्रेनें नहीं हैं, भागती सौगात हैं।
हर काल में, दिन रात ही तो बराबर
ये दौड़ती हैं।
रोक लेगा, धैर्य से,
चुप खड़ा होगा, देर तक, हर ड्राइवर!
गजब है सब।
शांति है, बस शांति है, बसों में, ट्राम में
दौड़ती इन ट्रेन में, बोलता कोई नहीं हैं।
इंजन.. भी कम हैं बोलते
इलेक्ट्रिक से सारे चल रहे,
एक भी आदमी, पेट्रोल.. पंपों पर.. नहीं है।
स्वतः चालित व्यवस्था है,
आदमी एक...
देखने... को, पूछने... को, है नहीं।
बर्लिन है ये,
राजधानी जर्मनी की, चुप सी क्यों है?
जय प्रकाश मिश्र
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