एक चोर है मन में मेरे, किससे कहूं !

पूर्व स्थापना: कोई भी व्यक्ति हो, अपने अंतिम क्षणों में ईश्वर के आगे हथियार डाल ही देता है और अपनी सीमितता स्वीकारता ही है, पर चाहता सब कुछ है उस ईश्वर से इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।

एक चोर है मन में मेरे, किससे कहूं !

रस.. सांवरे का, 
बह... रहा, अंदर.. मेरे..
ऐ! मन.. मेरे! 
मैं.. गलत, लाइन... 
क्यों.. लिखूं! 
अंतिम... क्षणों में, 
अरे! मैं..., अब किसलिए,
किससे... डरूं! 

भाव: जीवन के अंतिम क्षणों में प्रभुभाव ही पतवार बन जीवन नैया का मात्र सहारा बचता है इस सत्य को लिखने से मैं क्यों डरूं। 

तूं, साथ रह.., 
मैं..., चाहता.. हूं,
पवित्र, भी... रह..
क्यों..., तुझे.. दूषित... करूं! 
डरता.. हूँ, मैं..., 
मैं... आस्तिक हूँ, 
ईश... से.., परमात्मा से
झूठ.. काहे... मैं, कहूं।

भाव: हे, मेरे मन मेरी चाहना है, तूं मेरे साथ अपनी पूर्ण पवित्रता से रह। मैं अपनी इच्छाओं और राग-द्वेषादि के पंक में तुझे अब दूषित नहीं करूंगा। आत्मनिवेदन यह है कि मैं आस्तिक हूँ अतः सच है, मैं ईश से उनके कर्म-न्याय के कारण अपने अद्यतन कृत से डरता हूं 

भविष्य.. से भी, 
काल..के 
कराल मुख का, हल्का... थोड़ा.., 
डर.. मुझे.. है,  
पर..., सच.. कहूं..
मैं, निडर.. हूँ, कायर नहीं हूँ.. 
तूं... मां,  है... मेरी....
तेरे सामने, मैं... गलत, लाइन 
क्यों.. लिखूं! 

भाव: अपने अंतर्द्वंद्व में डूबा जीवन के अंतिम छोर पर पहुंचा भक्त जगज्जननी ज्ञान की देवी मां सरस्वती से अपना यथार्थ खोलता है, उसे संसार में काल के कुटिल प्रभाव का अभ्यांतर डर सदा रहा, पर उसने उसका निडरता से सामना भी किया, यद्यपि काल प्रबल और विजेता रहा। तभी तो मैं सत्व से जीवन में कई बार गिरा। आंतरिक ज्ञान मुझे तब भी था की मैं कुटिल काल गति का शिकार बना। 

एक, चाह.. है, 
सदा.. थी, क्या.. नई है? 
तेरे दर.. मरूं, बनारस-धरती.. मरूं..
और क्या.., मुझे चाहिए? 
क्यों... छुपाऊं, 
सच... क्यों न, कह.. दूं! 
अरे! अब.. किसके लिए! 
पर्दा.. रखूं! 

भाव: हर आस्तिक हिन्दू की एक अंतरचाहना होती है जीवन जैसा भी हो पर मृत्यु सार्थकता पाए। बनारस:काशी शिव की नगरी जिसकी चाह कबीर तक को थी, मुक्तिधाम है, में अंतिम प्रयाण की इच्छा उसकी भी है।

ठीक है, 
सब बात... तेरी...
मानता हूँ...
मुफ्त की..., हां.. मुफ्त की.. 
रेवड़ी..., मैं चाहता हूँ, 
उसे पाना चाहता हूँ...!
पूजा..! जिसे.., 
सच्चे दिल... से, आज तक, 
उसी की दरकार, अब 
बस.. है मुझे..!
समा जाऊं 
उसी में, बनारस के घाट पर,
इसमें क्या कुछ.., स्याह.. है।
धर्म को नहीं मानता... जटिलता में
धर्म.., करता मैं नहीं....
पर 
धर्म की सीढ़ी चढ़ूं, 
और मुक्ति से मैं, जा मिलूं, 
यही अंतिम चाह है।

भाव: मुक्ति प्राप्त आसान नहीं, पर काशी से अंतिम प्रयाण इसकी सुविधा देता है। एक तरह यह मुफ्त की रेवड़ी ही है। इस अंतिम स्थिति में अपने इष्ट सदाशिव की कृपा से मूल लक्ष्य मुक्ति मिले यह हर आस्तिक हिन्दू का जो बहुत खुलकर धर्म में भाग नहीं लिया न ही वैसा कर्म किया वह भी चाहता है। 

मुफ्त में, बनारस... मैं... 
क्यों.. मरूं! 
आखिर.. यही तो, बात है? 
रस.. सांवरे का, बह रहा, 
अंदर मेरे
मैं, क्या.. लिखूं! क्यों लिखूं ! 
गलत.. लाइन, ऐ... मन.. मेरे,! 
तूं साथ रह, मैं चाहता हूं,
पवित्र भी रह..
क्यों तुझे दूषित करूं! 
चाहे... जहां पर, मैं.. मरूं...!
एक चोर है मन में मेरे, किससे कहूं !

भाव: अंतिम बार अपनी सम्हाल करता भक्त कहता है मैं कर्म सिद्धांत पर विश्वास करता हूं
मैं सत्य का पूजक हूँ, वही सत्य.. ईश भी है अतः मैं कोई इच्छा क्यों करूं। मुझे वह मिले मैं जिसका पात्र हूं, हे मन मैं और तुम पवित्र हैं, हम सांवरे श्याम के रस से, प्रेम से पगे हैं। हम क्यों याचना करें, डरें। फिर भी एक चोर अपना निजी है काशी की चाह उसे किससे कहूं। 


जय प्रकाश मिश्र
jai prakash mishra


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