अरे! मैं... कैसे.. हंसूं!
पदधूलि: आज जीवन और इसकी सफलताएं वास्तव में वस्तुगत परिभाषित हैं। सफलता की मापें भी सामान्यतः वस्तुगत ही हैं लेकिन यह ठीक नहीं। आत्म-तत्व, चेतनत्व सदा बड़ा ही रहेगा, जैसे संतोष.. सबसे बडी प्राप्ति.. को छोटा कर सकता है, सादगी.. और विश्वास पूर्ण जीवन विलासिता.. और आधुनिकतम जीवन शैली को मात दे सकते हैं। आपकी मनःस्थिति व्यक्त जगत और आपके परिवेश से अलग हो सकती है, इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
खो… गया है,
कुछ.. मेरा,
मैं.. क्या करूं! किससे.. कहूं!
एक.. बेबसी, भीतर.. कहीं है,
दीखती.. बिल्कुल नहीं है..
तूं जहां.. है, वहां से.
अंदर... कहीं.. है।
मान…मेरी, जिद न कर..
तूं, मुझसे.., ऐसे...
अरे! मैं... कैसे.... हंसूं!
एक बार, इसको... सोच.. भी तो!
भाव: संसार ठीक वैसा नहीं है जैसा बाहर से दिखाया जाता है या दिखता है। सभी में भीतर एक आत्म होता है जो बाह्य रूप से अलग खुश या दुखी, कारण लिए होता है पर दिखाई नहीं देता।
आज… आया, समझ में,
अच्छे.. से मुझको..
व्यक्तिगत..
कुछ बड़ा होता.. हम सभी में।
जगत की..इस, अपेक्षा!
इस विश्व की, हर.. वस्तु.. से,
बेकार.. है, हर वस्तु..,
वह.. जो खींचती… है,
निर्जीव..., ही है,
दुनियां..ये अब.., मुझे दीखती... है।
कुछ नहीं है, आज..
यह....!
जब.. चाह... इसकी, मर.. गई है।
देख कैसे.. आज यह चुप चुप खड़ी है।
खो… गया है, कुछ.. मेरा
अरे! मैं... कैसे हंसूं।
भाव: दुनियां तभी अच्छी लगती है जब आत्मतत्व अपने स्वभाव में अर्थात प्रसन्न हो। इस चेतनत्व से बड़ा संसार नहीं हो सकता। यह वस्तुनिष्ठ विश्व उस संवेदना को सदा एक सा ही प्रभावित नहीं करता यह चैतन्यता पर आश्रित है।
मैं.., नहीं
अब.. विचरता हूँ, मध्य इनके..
सोचता ही हूं नहीं.., इनके विषय में।
मैं हुआ, खुद.. गुम, कहीं
अपने ही, भीतर..
खुली आँखों देखता, बाहर खड़ा हूँ!
पर नहीं... पहचानता, इन्हें अब मैं..
अपने भीतर..हूँ, यहां
हूँ... कहां..मैं,
तुम नहीं, ये देखते.. हो,
मैं, खो… गया हूँ,
या... खो.. गया है, कुछ मेरा..,
मैं.. क्या करूं!
सोच तो एक बार, मैं.. कैसे हंसूं…!
भाव: मन खुश नहीं तो संसार दो कौड़ी का। आप राजभवन में खड़े हों और मन ऋषि कुटिया में हो तो आप वस्तुनिष्ठ से दूर मनोमय जगत में होते हैं। लोग आप के वास्तविक सत्य को नहीं, जागतिक सत्य को ही देखते हैं।
सुंदर.. हूं, मैं..., ऐसी.., नहीं, हूं,
फुलझरी..., बीती नहीं... हूं!
उलझी लटें,
तुम देखते हो, आज जैसी..
सामने.., इस वक़्त..,
यह, ऐसी नहीं... हैं
रेशमी हैं,
बांध लेंगी मन तेरा, सच!
कह रही हूं,
इस तरह, मै… पेश आऊं..
मेरी, ये फितरत.. नहीं है।
मान मेरी बात, मैं सच कह रही हूं
खो… गया है,
कुछ.. मेरा, मैं.. क्या करूं!
सोच.. तो, एक बार, मेरा... हाल!
मैं.. कैसे हंसूं…!
जय प्रकाश मिश्र
भाव: इस हाल में बेचारी सी, उपेक्षित लगने वाली ये दुनियां अर्थहीन तो नहीं पर शक्तिहीन हो स्वामी अर्थात चेतन तत्व के समर्थन के बिना सुंदर होकर भी सुंदर नहीं होती, जंगल के पुष्प सी झर जाती है। यह भी चेतन में ही खिलती और खुश होती है, उसके बिना नहीं।
जाने न कितने, झांक... कर,
बादल..., चले गए....
बेताज़.. कितने बादशाह...!
सजदा... हुए,
चेहरे... पे, इस..,
झुक... के, चले... गए
परछाइयों... के अभ्र...,
हिमालय... से आए... कुछ
बिन बनाए, रेख... एक
वे...., सब... चले गए।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: दुनियां का सौंदर्य आपसी ताल मेल से ही है। सबके अस्तित्व से सभी का अस्तित्व कहीं गहराई में जुड़ा है यह सत्य है इसे जाने।
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