आल्पस पर्वत बनेगा शीघ्र ही वो!

आज का माहौल क्या है: दुनियां पुनः युद्ध के भयावह अंगार पर खड़ी है, लगभग सारे देश, खेमों में बंटे, आज एक दूसरे को असह्य, आघात प्रतिघात दे रहे हैं। आदम चेतनाएं यदि.. शांत न हुईं तो मानव और प्रकृति दोनों इसका दुखद.. दंश पाएंगे। मानवीय लालच और इगो के चलते, सतत नाशक रेडियेशन वाले न्यूक्लियर वेपंस से पृथ्वी की जीवनी शक्तियां नष्ट हो सकती हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।


तोड़ मत तूं! 

रश्मि.. रथ के, चक्र.. को इस

वरद.. हैं, ये .. जीवनी हैं, धरा की ! 

मिल सकें.. ये, और आगे..,  सदा ऐसे… 

इसके... लिए,  हे मानवों..

मिल.. जुल.. करो,  कुछ..।


शांत, शीतल.. उर्वरा,  यह रह सके..

जीवन जने.., सतत आगे.. 

स्वस्थ ही.. 

बच्चे..!  तुम्हारे, 

वनस्पतियां... स्वस्थ हों..

इसके लिए, हे... मानवों..

मिल जुल.. करो कुछ.., आज ही।


बहुत.. पहले, ”लिटिल.. बॉय”, 

मात्र……, 

देखा… विश्व ने...,  हिरोशिमा… पे, 

गिरता…. हुआ, हतप्रभ… हुआ था..।

हाय! कैसा दृश्य.. था, 

विदारक....,  वीभत्स.. था,

उबरा… नहीं है, आदमी यह, आज तक…भी। 


नाक.. है, 

तो कान.. गायब!  आज... तक! 

क्या चाहता है! आज भी, 

यह आदमी!  

बस! सोचता हूँ! आज मैं...  

बैठा... हुआ,  युद्ध के...

इस आग.. के, जलते... मुहाने, बैठ कर!  


क्या तोड़... दोगे, पंख.... सारे!  

हवाओं... के, पक्षियों... के.. 

स्वप्न.. के! इन मानवों... के..? 

कल्पना... को, नोच.. दोगे, 

गाड़.. दोगे!  

मनुष्यता को और गहरे..!  

क्या करोगे? 

आदमी हो! आदमी से वैर करके! 

पूछता हूं मैं नहीं ? पूछता है आदमी! 

सुख चैन सारे, छीन लोगे...  

छीन लो.. 

क्या हमारे छोटे दुख से 

और... भारी.., हटक धारी.., विनाशकारी 

अजन्मी उस संतति... को कष्ट.... दोगे ? 


कौन हो तुम! 

लड़ रहे, एक दूसरे से, 

आन बानी शान में, इस तरह... !

करोड़ों का खर्च करते.. जलाते हो पटाखे !

मर रही जनता जहां की, भूख... से! 

तड़पते बच्चे बिलखते... 

रो रहे हैं, देख.. तो! 

छोड़...,  मिल सब, युद्ध, अब तो 

इसके लिए, हे मानवों..! 

मिल जुल.. करो कुछ.., आज ही से।


सदियां.. लगेंगीं..., सोच लो!  

न्यूक्लियर इस युद्ध के 

संताप की ही....,   मुक्ति.. में,

कीमतें...,  इस युद्ध की,  

चुकाने में... 

बीत... जाएंगी, न जाने पुश्तें.... कितनी! 

हा ! तुम्हारी...

गालियां तुमको मिलेंगी... 

मात्र....... बस  

हिटलर के ही...जैसी, जर्मनी सी.. 

अरे...,  अपने देश.. में।


नष्ट हो जाएगी धरा, 

यह... मुस्कुराती, तेरे कारण

सोच तो, इगो से तेरे... !

तितलियां रंगीन.. इतनी उड़.. रहीं है 

आज सारी 

गगन में, पुष्प पे... खुश बैठती हैं

तुझे श्राप देंगी, 

आल्पस पर्वत बनेगा शीघ्र ही तूं, 

सहेगा संताप... इनका, पाप..इनका

युग युगों तक.. 

अकेला ही बैठ कर तूं!  

शीत में धूप में अबोला हो।

जय प्रकाश मिश्र





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