स्पर्श, करता हूं, हृदय... से।
आज की परिदर्शना: काव्य कर्म भी शैल-खंड की निरा-चट्टान से एक विहंसित, प्रफुल्लित, कल्याणमयी, सर्व-स्वीकार्य मूर्ति का निर्माण जैसा ही है। हर दिन सालों साल यह चलता रहता है, अनवरत...! साथ में एक प्रेक्षा! हर दिन पीछा करती है, आज जो लिख भेजा गया, उसका क्या हुआ? अपनी जो भी पूंजी होती है ज्ञान की, अनुभव की, समय की इसमें यज्ञ-समिधा सी नित्य डाली जाती है। आप के मन में कहीं एक छाप इन शब्दों की बने इस प्रत्याशा में अपनी पूर्णता खोजता काव्यकर्मी नित्य आप तक पिछले अनेक वर्षों से हर दिन आते रहे हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनन्द लें।
"पाषाण-पूजा" कर रहा हूं...
अनवरत...नित्य ही,
मै.... बैठ कर..,
धार.. भर, भर..,
चलाता हूँ, सब्र से,
अपनी विधा में, अस्त्र अपने...
आप तक..., स्नेह के।
भाव: "पाषाण-पूजा" यानी जिसमें बस आप अपना दायित्व निभाते हैं। शेष मौन से पाला पड़ता है आपका, मात्र विश्वास ही जिसका सोपान होती है। उसी तरह हर काव्यकर्मी अपनी लाइने, नित्य आप को भेजता है, बिना आपकी किसी मुखरता के।
छीनी..., नुकीली..
ठोंकता हूँ, बहुत धीमे, प्यार से...
हर बार ही,
मैं...
सुधारता हूं..., वार अपना
पुनः आगे..,
संभालता हूँ, ठोंक अपनी, शब्द के।
भाव: अपनी भाषा, भाव और विषय को आपके अनुकूल, करने की कोशिश करता हूं, सुधार कर, सौंदर्य भरता हूं।
परिणाम को, हर... देखता हूं,
गौर.. से।
नेत्र भर .., घाव को हर.. देखकर
वजन करता....
नित्य.. इनको, बूझता... हूँ !
स्पर्श, करता हूं, हृदय... से।
भाव: अपनी छठी इंद्री से आपके विषय में अनुमान लगाता हूं, समझने की कोशिश करता हूं और आपकी रुचि संवेद्यता को आपसे दूर रहते महसूसता हूं।
मूर्ति कैसी यह बनेगी
एक दिन..!
यह सोचता हूँ, विनत हो!
पुनि, बैठता हूं, अनुमानता, हूं!
मन मंदिरों में...., क्या रख सकुंगा?
इस मूर्ति को, इन मानवों के हृदय पट पे।
या यहीं......,
ये, भीगती..., ही..., क्षार... होंगी,
नभ पटल के, यूं... ही, नीचे....।
भाव: अपनी काव्य देवी की मूर्ति आपके मन पर कैसी बन रही होगी इसकी कल्पना और उसे अच्छा बनाने का सतत प्रयास एक संदेह के साथ करता रहता हूं कि कही सब बेकार तो नहीं होगा।
चाहतें... भर,
रोज... मैं..
इन्हें... भेजता हूं, आपको..
सच! प्यार से,
ये घर बनाएं, खुद ही अपना, आप में।
बस एक क्षण... को,
आप खुश.. हों, भीतर कहीं से,
पढ़ के इनको... फेंक दें!
और फिर... क्या?
मेरा तकाजा! कभी होगा आपसे!
ईश्वर... करे, कोई शब्द... मेरा
आपको ऐसा... चुभे..
ये मनुष्यता..
बस
पग एक तो, आगे.. बढ़े।
खयाल, सब.. एक दूसरे का, रख सकें।
जय प्रकाश मिश्र
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