एक चादर, झीनी.. झीनी..,
आज की बात: जीवन भर हमारी जरूरतें मात्र सामग्री आधारित ही नहीं, समय के साथ स्वरूप बदल लेतीं हैं। सब कुछ पा लेने पर भी, जीवन की शाम में, रात्रि एकांत में, सुखनिदिया की चाह किसे नहीं। प्रातः ऊर्जा और कार्य-आनंद, जीवन के दोपहर में एक शीतल, मधुर साथी की परिछाया किसे नहीं चाहिए। इसी पर ये लाइने पढ़ें और आनंद लें।
एक चादर,
तम... भरी, मैं... खोजता हूँ
ओढ कर, जिसे, सो सकूं...,
आराम से..., हर शाम.. को,
हर रात.. को, निर-अकेले,
एकांत में..
इस जिंदगी में..।
छोड़ सारे...प्यारे.. प्यारे...
खिलौने वो....
खेल करके, रख दिए हैं,
जिंदगी से दूर अब ..,
सच... बेवजह थे,
यह.. जान कर,
सत्य... सब पहचान कर..
शांति में, प्रशांति में, निर्विघ्न होकर।
पर..
एक चादर!
दूसरी... हो, रुपहली,
सुनहली..., सुंदर.., मनोरम!
रज... से, भरी , नवलिमा के
प्रभात... सी.. ऊर्जा लिए...
चमचम.. चमकती
अरुण की,
पहन.. जिसको, उठ सकूं...
हर प्रात.. को, जीवन बुनूँ,
मधुमक्खियों सा, मीठा.., मधुर,
मैं चख.. सकूं,
रस सुरीला
इस जिंदगी का, नित्य ही।
क्या है जीवन ? मैं सोचता हूँ...,
घनेरे,
बिरवा तले.. एक्! बैठ कर...
धूप... में,
इस, चिलचिलाती.., जलती हुई,
जिंदगी की... राह पर..,
कुछ भी नहीं... है,
छांव बिन..
जिसे, ओढ.. कर, कुछ देर.. बैठूं..
आराम से, बेकाम से,
मैं हल्का होकर
प्यार में
सुख दुख बिताऊं, एक बनकर
बांट लूं खुशियों के कुछ पल।
और क्या है जिंदगी... मैं सोचता हूं।
सच! एक चादर, झीनी.. झीनी..,
घिसी.. भीनी..
और..., मुझको चाहिए..
आ गया हूं, आखिरी उस मोड पर
कुछ नहीं अब चाहिए...
अपनों.. के सारे, देश.. के इस,
खुश.. खैरियत, खबरों से बढ़कर...।
और क्या है! जिंदगी... मैं सोचता हूं।
और क्या थी? जिंदगी... मैं सोचता हूं।
जय प्रकाश मिश्र
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