हे..! राधिके..! तुम... जानती हो! सच.. मेरा!

भाव दर्पण: ब्रजभूमि जगज्जननी श्रीराधे और श्रीबिहारी जी की लीला भूमि है। चमत्कारिक,  दिव्य अनुभूतियों की, आनंद की, यह अनन्य रसीली भूमि है। रमणरेती पर स्थित इस्कान मंदिर में मेरा जाना हुआ और वहां मेरे विश्वास अनुसार मुझे श्रीराधा के दर्शन उस स्थिति में हुए जब वह श्री श्याम दर्शन को अपने संपूर्ण रूप सम्भार में सजी दाऊ को, अंजानता में अनदेखा कर आगे, मुरारी की ओर बढ़ गईं। पर अनुभाष होते ही लज्जावनत हो झुक गईं। इसी पर कुछ पंक्तियां आपको.., आपके, आनंद.. हेतु प्रेषित हैं।

हे..! राधिका..!  
तुम... जानती हो! 
सच.. मेरा! 
देखा..है, तुमको
एक...क्षण को 
पर!   
पास.. से, 
निरखा.. है, मैने.., 
पार्थिव.., 
इन चक्षुओं.. से,
तेरी उस..  
"चमत्कारी...आ-प्रसन्ना"...
मुक्तकारी.. गात.. को। 

उचकते.., चलते.. हुए,
बिल्कुल अकेले...
रंगे हाथों..! 
ताक में..!  
श्रीवृजबिहारी.., 
घनश्याम के प्रियदर्शनों की
आस में..,
उन्मत्त नद... की, 
अंतर्ग्रथित... आप्लावनी.. 
सलोनी.. उस प्यास...  की, 
उछाल.. में, 
आप्तता, गोदी लिए, 
बढ़ते हुए..
राधा...!  
तुझे, देखा है मैने...।

बेहाल.. से, 
उस.. हाल.. में, 
सरकते.. थे, वस्त्र.. सारे 
एक संग, अधो.. नीचे...,  
अरे! तेरे..! 
निज हस्त से, पकड़े हुए.. तुम
शांत.. स्थिर...! 
नहीं रे..! उतावली..! 
विकल हो! कोई हंसिनी! 
तिर रही हो, तीव्रता ले..
मानस सरोवर... झील.. पे,
उस तरह, 
देखा... है, मैने..., 
सच... 
कह रहा हूं! 
तुम चल रही.. थी, 
प्यास..., आंखों में.. भरी थी,
कि, शायद, तिर.. रही थी,
आपाद.. 
नखशिख, स्निग्ध.. थी,
चितवन कहीं.., पद थे कहीं..., 
आंखे चतुर, चंचल प्रकृति.. थी
कैसी.. कहूं! 
तुम लग रही थी! 
पर, सच कहूं! 
तुम... फब.. रही थी।

पट लपेटे, 
नवल रस... माधुर्य.. का, 
रस गागरी..हो
छलकती..., तुम! दिख.. रही थी।
छनकती, गरिमा भरी...
ओज..नेत्री, तेज रूपा, तेजस्विनी... 
झरता हुआ.., झरना मधुर.. 
झंकार.. करता, मदिर हल्का...
रस प्रीति... का.. 
ले..., बह.. रहा हो; 
पवित्रता..
पग रख रही हो, भूमि पर! 
आह्लाद भर भर, विपुल.. क्षण क्षण
तुम कदम.., ऐसे.., रख रही थी,
क्या? सत्य में 
तुम.. चल रही थी।
उड़.. रही थी, पगो पर.., या परों पर
मैं विभ्रमित हूं आज तक! 

लज्जा.. समेटे 
अंक में, 
गर्व.. भर, पद ताल में,
हंसिनी.. हो तैरती, 
मानस.. सरोवर झील.. में
कुछ इस तरह, 
विजित.. 
सारे राग, वैभव-वैभवी तुम! 
लग रही थी,
क्या दृश्य था, सच! जानती हो! 
तुम...
खुद ही अपना... 
मैं.. और आगे क्यों लिखूं! 

सोचता हूं! आज जब उस रूप को! 
तो पूछता हूं, अपने मन से..
तुम्हे!  दिखाना.. था, 
स्वयं... को, 
उन.. श्याम को.., 
या देखना.. भी.. लक्ष्य था, 
उस..., सलोने.... को..।
मैं, देख! तुमको...भ्रमित... था, 
वह रूप तेरा, चितवन तेरी,
तूं जानती... है...
मैं... 
जानता हूँ, 
वह चमत्कृत.. 
रूप... का, वैभव.. तेरे! 
लौकिक नहीं, पारलौकिक से अधिक था। 
विपुल था।

लयबद्ध.. कैसा, 
पुष्प के हिलकोर सा, 
वह हिलकता, अभिसारता
अभिगमन तेरा..
हो छंद मुखरित छंदमय 
ऐसा... स्वयं था। 
पदबंध बंधित पग तेरे, 
छुनछुन, छुनाछुन 
बज रहे थे,
पद-किंकिनी, पद-रंजिनी, 
कंकण करों में... क्वणन... 
अद्भुत कर रहे थे।

गीत गाता.., पवन.. था
या गीत.., खुद को.., गा रहा था,
मृदंग, ढोल, पखावज...., 
रस-रंजिनी..., सुर.. दे रही थी, 
आनंद था वह.. बरसता, 
या रमण-रेती -रस.., ही.. था।

सरसराहट वस्त्र की, तेरी... 
खींचती.... थी, ध्यान.. कैसे.. 
मुनि जन, चकित थे! 
क्या हुआ था
आज! 
राधे! 
प्रसन्नवदना..!  
भंगिमा के साथ ही, कृष्णार्पित थीं..!  
खींचती थी, मन मेरा..
किससे कहूं! कैसे कहूं! 
सच कह रहा हूं! 
चितवन मेरी, 
चित मेरा!
सर्वश 
मेरा,
हर* चुका था।


तूं, अग्रसर.. थी,
नग्न.., 
पद.. थी
कान्हा शिविर की राह में
बचते हुए बलदाऊ से
चलती.. हुई 
झोंका पवन, बन.., बह गई.. थी।
उस झोंक में, 
दृष्ट को अदृष्ट करती, 
तन्मयी.. श्रीकृष्ण हो 
तुम..
बढ़ चली थी।

ध्यान आया, तब तुम्हे
दाऊ खड़े हैं, सामने..
तकते तुम्हे..,
तुम.. झुके नयना, ..वनत बदना 
ओट लेती,आंचलों से
किस.. चपलता से चल रही थी।
पकड़ी गई थी,
रंगों हाथों चोरनी.. तूं, 
लग रही थी
रूप की, 
श्री कृष्ण के, जो चुप खड़े थे
सामने..
नेत्र तेरे टंगे थे, अरे! किस तरफ
इसे मैं... कैसे.. लिखूं! 

लालची तूं! 
दर्शनों.. की प्यास.., 
तेरी! अरे! कैसे.. छूटती..! 
बदली.. बनी तूं, उमड़ी.. हुई थी
श्याम.. बादल..
अरे! कैसे.. छोड़ती.. तूं! 
प्रभू...! चुप.., सब देखते,
अश्रु.. भर भर, 
दृष्टि धूमिल, हृदय आभर
आंख से, तुझे देखते
विह्वल हुए थे।

बहती..., गई तूं.... 
मन-आस.. ले, झोंका.. बहे ज्यूँ.. 
समीर बन.. किसी 
कुंज.. में, 
सच! बह गईं थी राधिका..! तूं...!
पग.., थम गये थे, 
देखकर श्रीकृष्ण को,  दृग.. जम गये थे, 
पाषाण निष्ठुर हो पड़ा 
सामने.. भगवान के, रूप के संभार तेरे
अरे सारे....
अवनत.. पड़े थे।

फेंका.. हुआ, आचमन... जल, 
शुभ्र.. निर्मल.., 
गिरता.. हुआ आकाश.. में
जम गया हो, 
एक.. 
क्षण में, 
नयन तेरे, थिर हुए थे, 
श्री कृष्ण के... 
उस सांवरे.., काले... से मुख पे।

पार्थिव... थे 
नयन.. 
वे.., 
पर अपार्थिव से मिल रहे थे।
रमण.. रेती, 
देखी.. है, 
मैने, 
यह सच मेरा, ये शब्द मेरे
उनके लिए हैं।
राधिका, आज भी, आती वहां हैं... 
देखा है मैने... रेख उनकी 
सच कह रहा हूं, 
यमुना तटों 
पर,
चांदनी बन, छनती हुई
कदंब तरु से।
क्रमशः आगे.. आप की अनुशंसा पर।

जय प्रकाश मिश्र




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