तेरे-मेरे बीच.. के ये.. पुल... तो हैं

परछाई परिचय: हमारी संस्कृति में वाक् स्वयं देवी सरस्वती हैं, जो स्वच्छ, सुंदर, कोमल भाव और विचार स्वरूपिणी हैं। शब्द चाहे किसी भाषा के हों या जीव जंतुओं की बोली हो, वही संपर्क माध्यम हैं। अक्षरों से बने शब्द, और स्वर के रेशों से बने अक्षर, स्नायु तंत्र में बसते हैं। जो पूरा एक विज्ञान है। हमारे यहां मेरु में पांच और भृकुटि या मेरु मूल में एक, कुल छह केंद्र हैं जिनमें चार, छह, दस, बारह, सोलह और दो पंखुरी वाले कमल की संकल्पना है। ह और स के बीच सारे अक्षर इन केंद्रों के कमल दल पर स्थित हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

शब्द क्या हैं, कुछ तो हैं

तेरे-मेरे बीच.. के 

ये.. पुल... तो हैं

शेष.. क्या... है! 

राख.. है! 

ये..., राख से, अच्छे.. तो हैं।


निकलते हैं, कहां से ?  

ये शब्द! 

पूछा एक दिन 

चिड़िया हंसी, बोली भी कुछ..

वह, सच ..! 

सोचता हूँ, आज तक 

वे शब्द थे, था स्वर कोई?  

आग्रह था मुझसे, दर्शन कोई? 

क्या... बताना, 

वह चाहती थी, मुझे तब।


शब्द... अक्षर से बने हैं, 

सब जानते हैं! 

अक्षर कहां थे, मात्राएं..., कहां थीं

षष्ठ कमलों पर रखी थीं

मेरुका के दंड पे

आदि से,

बीच में उस.. हंस के,

कबीर के उस जिक्र में  "हंसा केलि करै"


चतुष्पद, षष्ठपद, दशमपद, 

द्वादश पदल होते हुए, 

षोडश पदल, और द्विदल 

कमल दल के पृष्ठ पर, 

नस नाड़ियों के बीच में

मूल, स्वाधिष्ठान होते 

और ऊपर तेज में, 

फिर वायु में, आकाश में, 

भृकुटि में

प्रकृति ने खुद संजोया है, 

इन सभी को, करीने से, आदि से।


कभी.. हवाओं.. का, गीत.., 

क्या तुमने सुना है! 

आकाश गाए, मृदुल, मीठा

रस.. अरे!  उसका.. पिया है।

सुरीला, मीठा, मधुर! 

स्वप्न... सा,

आवाज करता, सतत 

गिरता.., 

निरत बहता, झरता हुआ 

झरना... 

कभी, तुमने सुना है? 

पर्वतों के पृष्ठ से, 

खाली पड़ी, उन गुफाओं का

आमंत्रण भरा, बुलावा.., 

तुमने चुना है।

सुरंग से, उस निकलती.., 

दूर... ऊंचे... बजती हुई, 

स्वर.. बांसुरी का..

गुफाओं की ओट ले 

बहती हवा का

सुरसुराना क्या कभी तुमने सुना है।

नहीं ना..

एक बार सुनना, तब बताना, 

शब्द क्या हैं

शब्द के इन अर्थ का भी, अर्थ क्या हैं।

क्रमशः आगे..

जय प्रकाश मिश्र



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