बर्लिन विशेष: मधुमयी के संग का, बेसब्र इंतजार है।
परिचय: जर्मनी प्रवास के दौरान ये पंक्तियां लिखी गई। तद-समय समयभाव के चलते ब्लॉग पर नहीं डाली गईं। वहां की राजधानी "बर्लिन" में स्वयं की अनुभूत, सच्ची छंदित छवि, शब्दों में पिरो आप को संप्रेषित हैं। आप पढ़ें, और एक.. विकसित, सुव्यवस्थित, सुंदर शहर में इसके इतिहास सहित आज में घूमने का आनंद लें।
दो छोर हैं, इस शहर के,
स्पॉन्दूं... और ऑर्कनर....
दौड़ती है, ट्रेन इनके बीच में,
सतत... सरपट, हर समय..
हर मिनट पर.., तो नहीं..,
दो-दो मिनट पर।
एक आती, एक जाती,
रात... दिन.. शहर के, इन किनारों पर
ही नहीं, और आगे..
पोस्दाम से ले... मुगलसी, दूर... की
उस, झील... तक,
सप्ताह भर, हर दिवस, साल भर।
ऑर्कनर की तरफ पूर्वी जर्मनी था
स्पॉन्दूं की तरफ.. पश्चिम जर्मनी।
अब एक हैं, दोनों यहां,
पर...,
संजोए हैं, शौक से
चिर यादें अपनी.., आज.. भी,
ठीक से, वैसे... वहीं...।
बीच... में दीवार... थी,
एक.. बहुत लंबी..,
किलोमीटरों में... डेढ़ सौ से और भी....
ऊंची मगर..
बारह.. ही, फिट की..
पर लांघना... दुश्वार था..
बौछार थी, वहां.. गोलियों की
तड़तड़ तडॉतड़ सैनिकों की
उस समय!
काल के कपाल पर
एक रेख थी.., खींची हुई, यह!
वीभत्सता की, शत्रुता की,
रोकने को
मानवों को, मानव ही निर्मित..।
सोवियत की, एक विजेता... की,
हारे... हुए
एक राष्ट्र के, सच छातियों पर...
जीती हुई, उसकी उसकी जमीं के
माथ पर,
लकीर ही, उस जर्मनी पर।
तदसमय.., उन्नीस सौ पैंतालीस की।
स्मारक है इसका, बहुत सुन्दर
आज भी.. मुंह चिढ़ाता,
इस राष्ट्र... को
ट्रेप-टावर पार्क में, सुदीर्घ विस्तृत...।
शांत, सुंदर, सघन छाया, सुखद लेकर
एक सबक बनकर,
खड़ा है, शान से, आज भी
महत्वा-कांक्षणा... भारी पड़ी थी,
कभी...
कैसे... इस राष्ट्र.. पर!
उस धरा पर, धरा थी, जो
गर्व से फूले हुए..
विश्व विजयी-कांक्षा.. के हिटलरों की।
मात.. खाए मात्र.. थे जो, भाग्य से
बस, मूषको... के दंश से
कुतर डाले तार थे, इन.. महाशयों ने
विशालतम, शक्तिशाली, हजारों उन टैंको के
खड़े.. थे, ढके.. थे, जो खेत.. में,
सोवियत पर, समय से आक्रमण.. को।
बस सोच.. लें, यह आप..
जब था गर्जना..,
फेकना.. था, विध्वंशकों को,
स्टार्ट, ही... हुए नहीं..
मरी लाशों से पड़े थे, मूक सारे,
रणभूमि में, एक... पग, हिले... नहीं।
हार कर, तब जर्मनी, शतरंज की
उस चाल को..
खुद.. बिछ गया, एक लाश सा..
उसी ऊपर, यह "दीवार-ए-बर्लिन" बनी थी।
इतिहास... को समेटे,
तन... पर लपेटे, काल... को,
वस्त्र... सा, फर फर फहरता..
खड़ा.. है, यह शहर...
लेकर, आज भी
ठीक वैसे घाव अपना, दिखाता
हर नागरिक को, स्वयं ही..
देख सकते हैं वहां, बीच ब्रांडेनबर्ग पर,
बम्बार्ड के उन ध्वंस को जो खुले हैं
आकाश में, रो रहे.. हैं, आज भी
सिसकते.. धुंअवठे हुए
दूसरे विश्वयुद्ध के।
छुपाता कुछ भी नहीं है
ये शहर... है, आज... भी।
आज भी है, गूंजता यहां यातना स्वर..
मूक बन, आर्त हो!
चीखता, पुकारता, उन ज्यूस का,
शिविर में.., कनसेंट्रेशन कैंप में,
छातियों पर, झेलता...
फेस पर, बदनुमा.. एक दाग, ढोता,
किलोमीटरों में, दूर तक फैला हुआ
सच! देखा है मैने..
वास्तव में, उसी ही.. रूप में
अंत हो! मनुष्यता का, मनुष्य के ही, कर्म से।
चल छोड़ सारी बात
आ.., कुछ बात कर लें, आज.. की
इस.. शहर की...
वाम पंथी सतह.. पर बैठा हुआ
यह शहर, चुप.. है,
अंतर्मुखी है
किसी.. ध्यान में डूबा हुआ,
प्रायश्चित ग्रसित है।
लोग हैं आत्मस्थ, डूबे आप में
बस काम से है काम,
हों निष्काम, जैसे
ऐसा.. दीखता है शहर ये..
पर हेयो कहते, दबाते हैं मुस्कुराहट,
अजब सी, फेस में, हर किसी से।
भव्य है, हर वस्तु, आकृति भव्य है,
कुलीनता है, शांति है,
सुव्यवस्था है
धैर्य.. गहराता हुआ है,
हर किसी.. में, झलकता...,
किसी... को, जल्दी.. नहीं है।
एक..
आवाज प्यारी..
बहुत धीमे, निकलती है..
हेयो की
हर किसी से, हर किसी को,
आपसी सद्भाव है,
किसी से मतलब नहीं है, किसी... को।
निज काम से बस काम है,
सब... बिजी हैं, निज उपक्रमों में।
एक.. उदासी.... है,
गोद में, इस शहर... के
मासूमियत.. भर, भर, नजर में..
तरल होकर
बह रही है, हर तरफ..
चितवन.. को बरबस खींचती....,
व्यथित मन को मुक्त करती, फिर... रही।
सच कहूं तो!
अच्छी जगह है, सच्ची जगह है
पर.. बहुत ही मंहगी जगह है,
हम... इंडियंन, हम एशियन को।
हर हाथ को यहां काम.. है,
हर आदमी यहां मस्त.. है,
मस्त.. क्यों, सा-खर्च.. है,
पेंशन के भरोसे,
निश्चिंत है, भविष्य से...
वीकेंड का, सप्ताह में,
शाम का दिन बीतते..
मधुमयी के संग का, बेसब्र इंतजार है।
जय प्रकाश मिश्र
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