बचपन
बचपन: शायद सबसे अच्छे और लुभावने दिन बचपन के होते हैं, इंद्रियों से जो सुखन इस उम्र में मिलती है, जीवन भर संभव नहीं। वो मानवीय रिश्ते, प्रकृति, और संसर्गों के नज़ारे, वो स्वाद, वो.. अलमस्त मस्ती फिर जीवन में कहां! इसी पर कुछ लाइने, आपके लिए।
गर्मी.. बच्चे जोहते,
आम.. पकेंगे डाल।
मीठे.. मीठे.. चुएँगे,
खाएंगे.. भर गाल।।
ठंढा.. ठंढा.. लगत है,
बहत पसीना.. धारि।
कूदि कूदि बगिया फिरैं
सारे... कृष्ण गोपाल..।
अमझोर्रा पानी.. पियें,
दादी... देंईं बनाइ…।
दिन भर सब गायब रहैं,
खेलैइ मिल.. सब धाइ।।
माखन चिक्कन खाई के,
मटका... पूछैय… कौन।
माठा.. साठा.. छोड़ अब
चल! यारा... मेरो.. संग।
नल का शीतल, जल अहा!
कईसा…, लागय गांव…।
पुरवैया…. अइसन….बहय,
मन, खुश..! ठंडी…. छांव..।
बचपन नहीं वह मस्तगी थी उम्र की
ढलती नहीं थी रात... तब,
दिन... ठहरे हुए थे, किस तरह..
चाहतें... मेरी थीं कैसे,
झूमती डाली.. लदी हो फूल.. से
रात दिन.. हम भागते थे, पवन.. हों
कुछ इस तरह हम दौड़ते थे
बचपनों में।
आ मिलें यूरोप से:
झूमती डाली.. लदी हो फूल से
कुछ इस तरह वे दौड़ती हैं
दौड़ते हैं, अश्व से
जो यहां पर बसे हैं..
रह रहे हैं।
सड़क पे, फुटपाथ पे
पार्कों में,
हर, खुले मैदान में..
हिरन.. हों वे मुक्त,
हर शामो-सुबह.. सच कह रहा हूँ…!
भीग जाते वस्त्र उनके..
बीच में ही,
भीड़ के,
इस दौड़ में,
उचकते रस घोलते हैं, सभी में।
चमक लेकर, स्वर्ण रेखा
कसौटी पर,
बन गई हो, स्वर्ण की
घिसने पे सुंदर!
ठीक वैसी..
चमकती हैं, अफ्रीकन..,
सुनहरी,
कोनों से चमचम..!
हर जगह, बेलौस, ठन-बन
घूमती.. हैं
फिर रही है शहर में कुछ व्यस्त.. होकर
कुछ आत्मगत है..।
सोचती भी जा.. रही हैं..
अलगा रही, सुलझा रहीं हैं..
गुत्थियां… जीवन की, वे..
सच, कठिनतम।
दौड़ते हैं लोग… जैसे
लहर…, फूलों की उठी.. हो
इठल.. करती,
सहज..है..सब. हवा के संग भागती
सन-सन, सना-सन, सन-सन, सना-सन
पार्श्व से..
मुस्कुराते.. हंसते हुए..
ओस भीगे.. होठ हैं,
असहज करते.. विहंगम!
पेड़ हैं,
चुपचाप सब कुछ देखते
किनारों पे, सड़क के,
लाइन लगाए…कतार में,
हाथ बांधे, चुप खड़े!
पूछते एक दूसरे से..
बिल्डिंगे पीछे खड़ी, छह सात तल्ले,
सुन रही सब,
लग रहा है देखती हैं..
अपने नीचे, दृश्य चलता.. दौड़ता..
हर एक पल, हर एक क्षण…,
पर स्वच्छता हर ओर है, अनन्यतम।
बाल पीछे खिंचे हैं, तने हैं!
हां तने हैं..
हर स्टॉप पर मै देखता हूं!
इस लिए! उभरे हुए चेहरे मुझे
सब दीखते हैं…
उजले हैं बिल्कुल.. सुनहरे
मुस्कुराहट से भरे हैं,
किनारों पे कुर्सियां हैं
सजी रखीं… सड़क के,
गुलदस्ते लगे है फूल के...
सुरमई सी शाम.. है,
फूल हों कुछ लोग जैसे..
इस तरह से चल रहे हैं
चमकते चेहरे हैं, उनके
ऊर्जा,
टपकती.. बह रही.., पर्वती सी,
उभरती..
हिलती..हुई, दुलकती..
कसी सी ये चाल है..।
एक उछलती..सी ”बाल” आई
चहकती…
बैठी.. बराबर…
सूरतें हैं.. संगमरमरी, चलती हुई
आकर यहां देखे कोई।
इन्तहा गर देखनी है..
तराशखोरी की… तुम्हें..
तो तुम शाम आओ
पेरिस-ए-टावर एफिल यहां..
सदा.. देखो गजब.. की।
हिलते हुए
तुम फूल देखो.. फूल में..
फूल हाथों में लिए,
फूल से चेहरे कई…
फूल की चाहत लिए
फूल पर चलते हुए,
तुम कली देखो गजब की, निखरी हुई।
एक नम्रता है, हर तरफ
सादगी है,
मासूमियत है, इनोसेंस.. है,
फैली हुई.., विशिष्ट कैसी!
देखती.. मुस्कुराती..
मचलती हैं
मूरतें.. हैं तराशीं..
खुद.. खुदा के हाथ की…।
बेलौस,
हैं ये घूमतीं.., फिर… रहीं..
रंगे हाथ.., कितने पास..
लेते मस्तियां.. देखी है मैने,
भीड़ के भी.. बीच में।
एक किरिच हो, बहुत पतली,
झुकी हो
नरम, पत्तों से लदी हो
कलियां लगी हों
खिलने से पहले, देखी हैं मैंने!
चलती फिरती, बहती.. नदी!
गिरती.. नदी..
बीच धाराओं के
निर्झर…झर रही, झरती नदी।
जय प्रकाश मिश्र
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