बेटी हूँ तेरी, चाहती हूं, खेलना, जगह दो..

माहौल क्या है: सच को झुठलाया नहीं जा सकता निश्चित ही, आज हम समाज की जो स्थिति देख रहे और दुखी हैं, उसके कारण, हम ही हैं। हम से अपने कार्य व्यवहार, आचरण, चरित्र, चालाकियों, अनावश्यक डांट डपट आदि के चलते, जाने अनजाने, मासूम बच्चों के बालमन पर दुष्प्रभाव पड़ा है, जो आज दिख रहा हैं। इसकी तह में जाकर ही इसे ठीक किया जा सकता हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें, आप आनंद लें।  

पहुंचना मैं.., चाहता हूं..., तली में 

अंधेरी... उस, गली.. में

उससे.. भी.., 

नीचे.., 

जहां पर, वह घाव... है, सबसे.. पुराना, 

इस.. आदमी... का

मन.. में इसके.., 

सबसे.. 

गहरे! 

जो...,  रिस.. रहा है आज तक, 

बिल्कुल अकेले.., बिन.. सहारे.. 

टीसता.. है, टपकता.., 

हर एक पल..में! 

यह क्या 

करे!  

प्यार के उपचार बिन, 

घाव... इसका, सड.. गया है। 


जानता हूँ, कीच... है, सड़न.. है, दुर्गंध है.. 

इसमें भरी, बचपन से लेकर 

आज तक.., निकली 

नहीं है..।


उस विंदु.. पर, जिस विंदु पर.. 

कड़ाई, सख्ती नहीं.. 

थी, 

चाहिए.. 

स्नेह.. का, प्रेम.. का, 

दुलार.. का, विश्वास.. का 

हाथ-मरहम.... चाहिए !  

उलटा हुआ है, साथ इसके.. 

क्या करे यह ?   

वही.. है, दुर्गंध... इसकी 

निकलती, 

आज भी व्यवहार में

वाणी... में, इसकी.. हरकतों.... में।


फिर.. दोष कैसे,  इसको.... दे... दूं..

ये, आदमी... था, मुझसे... बेहतर.... 

सच कह रहा हूँ, सच कह रहा हूँ।


एक बात मेरी, तुम सुनो,

उस घाव... से, काश, 

यह, तब.., बच निकलता 

सच सुनो, यह विश्व 

ऐसा, तब.. न दिखता।

जो.. जान लेगा, राज इसका, 

भभक*.. लेगा, 

फिर भी इसकी..

सड़ती हुई, बहती हुई, 

इस सांस.. से कभी भी

दुर्भावना......,  

नहीं.. पालेगा...,  हृदय में।


अरे! ओ 

मन.. मीत रे!  

मेरी.. बात सुन रे! 

मैं... क्या करूं, तूं दूर.. है, रे..!  

वो... रास्ता.., मिलता नहीं, 

तुम्हें...,  कैसे.. मिलूं रे !  

दूर.. हूँ, तेरी... नब्ज़... से, 

जो धड़कती है, तड़पती..तेरी रूह में।

मेरे साथिया!  मैं.. चाहता हूँ,  

तूं.. मुझे बस..., माफ कर दे।

तूं.. मुझे तो..., माफ कर दे।

पग दो..

उफनती… इस नदी का, 
कहर बन कर.. टूटना, 
याद.. रखना!  
शांत हो 
जब, 
पूछना.., क्या.. हुआ था? 
क्या कोई.. आघात था! 
प्रतिघात.. था! 
अवशेष 
था! 
इतना भयानक, उस नियति का? 

पग तीन..

कौन!  
होगा साक्षी!  
इस बह रही अनुपम पवन का
छू रही हैं, होठ.. से, अधर..से 
इस पुष्प को, 
नजदीक से, मधुरता से.. 
खिलते हुए, 
इस रंग बिरंगे, रूप को l
कौन होगा साक्षी, 
इन मेघ के भीगे बदन का
कपास से, उज्जवल हैं जो, 
भागते है, हिरन से, बदलते हैं 
रूप क्षण क्षण.. कल्पना के रंग भर भर!
मैं बेटी हूँ तेरी, चाहती हूं खेलना
इन सभी के संग, अब.. भी
जगह... मुझको
थोड़ी सी.., दे दो
पापा मेरे हो..
आज भी.... ना।

जय प्रकाश मिश्र



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