दिल लगा के प्यार कर! दूसरों से नहीं रे! अपनों से कर,

परि-मानस: आज विश्रृंखल होते, टूटते, बिखरते परिवार, उनके रिश्तों और जीवनों को, देख एक अंतर्व्यथ बादल मन को घेर लेता है। जरूरी है, हम अपने घरों और आस पास सदियों से पुरानी आजमायी संस्कृति और चलन को बच्चों में डालें, अन्य उपायों से भी उन्हें, इसे सौंप जाएं, जिससे उनका जीवन, कठिन पलों में सामंजस्य बना सके। आज के बाजारूवादी और पूंजीवादी व्यवस्था से भी उन्हें अवगत कराना लक्ष्य है, जो अपने ट्रैप में लाइफ़ को, समाज को कसते जा रहे हैं। जीवन और देश, इन पूर्व के स्थापित,"सादगी और सच्चाई" के रास्ते ही तुष्ट च पुष्ट हो पाएगा।रूपक के माध्यम से कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं। आप पढ़ें और आनंद लें।

गूथ... दूं, कुछ... बेल बूटे.. 
सितारों... के, साथ में
समय आये, जब कभी 
याद आए, सद्र*... मेरी 
पहन.. लेना।
भाव: 
रख लो, इन्हें..,
कहीं… करीने… से,  
जिंदगी… में, एक कोने..
जरूरत.. 
जब, आ… पड़े, 
तन्हाईयो... में तुम रहो, 
निकाल इनको..
खोल इनको, सेंस... लेना, 
देख..ना, 
सोचना, समझना, अच्छा लगे…. 
तो...., 
पहन... लेना।

झड़… रहे हैं, फूल... सारे,
बिना मौसम... 
देख.. ना !
खिल…रहे हैं, कितने.. सारे..
बेहयों.. से, बिना.. मौसम! 
समझ.. ना।
भोला है तूं ! वो…, खिलाड़ी हैं,
रंग… गाढ़ा, देख ना !
गूथ... दूं, कुछ बेल बूटे.. 
साथ में इन सितारों... के
समय... आये जब कभी 
याद आए, 
तुमको.. मेरी, तुम, पहन.. लेना।

चल, दूर चल.., कुछ अलग.. कर
चाल.. इनकी, समझ ना,
वो…, बो... रहे हैं बीज से, 
ये.. ट्रैप.., कैसे,
खोल.. आंखे, देख ना !
अरे! सब कैसे.. फंसे..
बढ़ते हुए इस मूल्य में 
तूं देख.. ना..!
मत पास जा, तूं.. इन सभी के
भावना को छोड़ अपनी
बात मेरी समझ… ना।
गूथ दूं कुछ बेल बूटे.. 
साथ में इन सितारों के
समय आये जब कभी 
या याद आए, मेरी तुमको
अच्छा लगे तो, पहन.. लेना।

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: प्यार कर.. प्रेम कर..

भाव: बंधन, वर्जनाएं, सख्ती, बंदिश, फौलादी ताकतों के भीतर जीवन नहीं लाशें रहती हैं। बीज को अंकुरित होने और पादप बनने के लिए पोली भुरभुरी मिट्टी चाहिए। सख्त मिट्टी में बीज सड गल जाएगा। सख्त  मुट्ठी की बालू पसीने संग बह जाएगी कुछ नहीं मिलता, सीमा से ज्यादा कड़ाई ब्यर्थ है। इसके विपरीत प्रेम, प्यार एक दैवीय शक्ति है, इस पर कुछ लाइने आनंद के लिए पढ़ें।

कुछ नहीं निकला.., ये सच.. है! 

उस, शख्शियत… की 

मुट्ठियों से, 

जो, बंद… थीं, सख्त.. थीं, 

फौलाद सी, दिखती.. मुझे थीं, 

उम्र के हर मोड पर, 

वज्र.. ही, थीं

ता-उम्र.. ही क्यों, जिंदगी भर...।


एक, आरजू.., पाले... हुए  हम.. 

आज... भी हैं 

लौह.. की, उन मुट्ठियों... से…

दिल.. में अपने.., मान मेरी !

एक...,  मुट्ठी रेत.. थी, 

बंद उनमें, 

अरे वो भी शुष्क थी, सूखी हुई..थी!

बंद थी अंधेरों में

तरस..ती, थी नेह को.. स्नेह को, 

प्रेम.. को, मान... मेरी, 

अब, वो... भी नहीं है,  शेष.., 

जाकर, देख ना...

गर्मियों से मुट्ठियों की, 

पसीने.. संग, फौलाद के संसर्ग.. से, 

पसीने… में भीगकर

वो.., रेत सूखी, 

निज आंसुओं में भीगती, बह… गईं है, 

खाली है मुट्ठी, 

मान मेरी 

अरे सच!  खाली पड़ी है।

जीवन... नहीं है, बंधनों... में 

उसे.. स्वांस दो 

इसलिए ही कह.. रहा हूँ

खोल मुट्ठी, फौलाद को इस गला दो।

कुछ नहीं था.. सत्य.. है यह

फौलाद की उन मुट्ठियों में 

कभी भी, धारणा.. ही गलत थी।

इसलिए तूं हंस.. थोड़ा,

दिल.. लगा,

प्यार कर…! दूसरों से नहीं.. रे! 

अपनों से कर, जिंदगी भर, जिंदगी में...

सुख से रह.., शांति से रह।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: प्रेम स्वयं में पूर्ण है, उसे किसी की जरूरत नहीं। हम उसे अपनाकर मान्यता दे सकते है वह करना ही चाहिए।

दीप्ति.. खुद में, दिख.. रही है

दिप-दीपाती..

और उसको चाहिए क्या? 

पूर्णता को, पूर्ण  हम.., कैसे करें, 

मान्यता ही शेष है, 

चल.., उसे.. अर्पित.. करें।

जय प्रकाश मिश्र


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