दिल लगा के प्यार कर! दूसरों से नहीं रे! अपनों से कर,
सितारों... के, साथ में
याद आए, सद्र*... मेरी
पहन.. लेना।
रख लो, इन्हें..,
कहीं… करीने… से,
जिंदगी… में, एक कोने..
जरूरत..
तन्हाईयो... में तुम रहो,
निकाल इनको..
खोल इनको, सेंस... लेना,
देख..ना,
झड़… रहे हैं, फूल... सारे,
बिना मौसम...
देख.. ना !
खिल…रहे हैं, कितने.. सारे..
बेहयों.. से, बिना.. मौसम!
समझ.. ना।
भोला है तूं ! वो…, खिलाड़ी हैं,
रंग… गाढ़ा, देख ना !
गूथ... दूं, कुछ बेल बूटे..
साथ में इन सितारों... के
समय... आये जब कभी
याद आए,
चल, दूर चल.., कुछ अलग.. कर
चाल.. इनकी, समझ ना,
वो…, बो... रहे हैं बीज से,
खोल.. आंखे, देख ना !
अरे! सब कैसे.. फंसे..
बढ़ते हुए इस मूल्य में
तूं देख.. ना..!
मत पास जा, तूं.. इन सभी के
भावना को छोड़ अपनी
बात मेरी समझ… ना।
गूथ दूं कुछ बेल बूटे..
साथ में इन सितारों के
समय आये जब कभी
या याद आए, मेरी तुमको
जय प्रकाश मिश्र
पग दो: प्यार कर.. प्रेम कर..
कुछ नहीं निकला.., ये सच.. है!
उस, शख्शियत… की
मुट्ठियों से,
जो, बंद… थीं, सख्त.. थीं,
फौलाद सी, दिखती.. मुझे थीं,
उम्र के हर मोड पर,
वज्र.. ही, थीं
ता-उम्र.. ही क्यों, जिंदगी भर...।
एक, आरजू.., पाले... हुए हम..
आज... भी हैं
लौह.. की, उन मुट्ठियों... से…
दिल.. में अपने.., मान मेरी !
एक..., मुट्ठी रेत.. थी,
बंद उनमें,
अरे वो भी शुष्क थी, सूखी हुई..थी!
बंद थी अंधेरों में
तरस..ती, थी नेह को.. स्नेह को,
प्रेम.. को, मान... मेरी,
अब, वो... भी नहीं है, शेष..,
जाकर, देख ना...
गर्मियों से मुट्ठियों की,
पसीने.. संग, फौलाद के संसर्ग.. से,
पसीने… में भीगकर
वो.., रेत सूखी,
निज आंसुओं में भीगती, बह… गईं है,
खाली है मुट्ठी,
मान मेरी
अरे सच! खाली पड़ी है।
जीवन... नहीं है, बंधनों... में
उसे.. स्वांस दो
इसलिए ही कह.. रहा हूँ
खोल मुट्ठी, फौलाद को इस गला दो।
कुछ नहीं था.. सत्य.. है यह
फौलाद की उन मुट्ठियों में
कभी भी, धारणा.. ही गलत थी।
इसलिए तूं हंस.. थोड़ा,
दिल.. लगा,
प्यार कर…! दूसरों से नहीं.. रे!
अपनों से कर, जिंदगी भर, जिंदगी में...
सुख से रह.., शांति से रह।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: प्रेम स्वयं में पूर्ण है, उसे किसी की जरूरत नहीं। हम उसे अपनाकर मान्यता दे सकते है वह करना ही चाहिए।
दीप्ति.. खुद में, दिख.. रही है
दिप-दीपाती..
और उसको चाहिए क्या?
पूर्णता को, पूर्ण हम.., कैसे करें,
मान्यता ही शेष है,
चल.., उसे.. अर्पित.. करें।
जय प्रकाश मिश्र
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