पैरों पे गिर, सलाम कर..

पृष्ठभूमि: आज पड़ोसी मुल्क के साथ युद्ध की स्थितियां बन गईं हैं। ऐसा क्यों हुआ उन लोगों ने मुल्क तो बना लिया लेकिन एक संप्रभु देश के लिए ग्रेविटी और शालीनता की शिक्षा कभी कहीं से नहीं ली। अपने को उम्दा मान, नाज ही करते रहे, समृद्धि के लिए स्थायित्व, शांति, के लिए विवादों से दूरी की जरूरत होती है सीखा ही नहीं। अनावश्यक तरफदारी, चौधराहट, खेमेबंदी, और बिरादरी के ठेके लेने लगे। नतीजा आज भी दुर्गति और दरिद्रता से उभर नहीं पाए। नेता और मिलिट्री ने गांठजोड़ कर देश लूटा और विदेशों में भागे, बाकी उसी में लगे हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

खेद है! 

बस, हम सभी को, 

आज तक.., इस बात का...

"सलीका.." सीखा नहीं 

तुमने! पचहत्तर.. साल में..।


कैसे, 

जिएं हम..,  

इस जहां में, साथ रह! 

एक दूसरे संग, प्यार से, 

सम्मान दे, सम्मान ले, 

गर्व से, अपनेपने.. से, यार हे! 


क्या करें? 

हम सब दुखी हैं, हिंदवासी...! 

आज! तेरी.... इस, 

बेवजह की, 

बे..हूदियाना, घात से।


इसलिए, 

ले झेल अब, 

भर गई है, बंध गई है, 

पाप की गठरी... तेरी अब, 

गिर.. रही है, आज तेरी आन.. पे।


सुधर जा!  

बाज आ! आज भी, तूं ... 

क्या बचेगा..! सोच तो, 

क्या बचा.. है, आज ही, 

अरे! तेरे पास में।


यार! क्यों दुश्मन हुआ है?  

गरीबों का.., मज़लूम्स का, 

बेसहारा... रियाया का, 

अपनी प्रजा का..

तेरे.. देश के,   वे..., लोग हैं, 

रोटी.. की खातिर!    लड़ रहे थे, 

अभी.. कल तक

तूं समझता क्यों नहीं, इस बात को।


कहां जाएंगे, बिचारे, 

सोच तो!  

भूखे हैं वो..

विलायत दूर.... है, उनके लिए

मान... मेरी,

तेरे....जैसी नहीं, आसान... है, 

घर बार सी, उनके... लिए।


लूट तेरा काम.. है, लूट तेरा काम था..

लूट... तूं! 

वो बिचारे कब... से चुप हैं! 

खामोश! खुश... हैं, 

हैं..... जहां, आज भी, जिस हाल.. में।


बख्श.. उनको!  

सजा.. दे मत! सोच.. उनकी! 

आदमी की जात हैं वे..! 

जात.. तेरी ही, भले.. हों, 

पर आदमी... हैं..

इक्कीसवीं... इस सदी की ही, 

आदमी की.. जात के..।


कोई.. नहीं है, 

जो बचाएगा उन्हें.., मैं जानता हूँ, 

इसलिए ही कह रहा हूँ.. 

मान जा, शांति से रह, 

भूल जा कश्मीर को

वापस तूं कर दे जो बचा है, 

आज कल में, शांति से।

आराम से रह, 

चौधराहट... छोड़ दे।

ठीके भी लेना छोड़ दे।


सोच अपनी... अपनी प्रजा का

रास्ते चल, नेक बनकर! 

समृद्ध बन, रगड़ अब से... छोड़ दे।

पैरों पे गिर, सलाम कर.. 

भाई तेरा है.. बड़ा भी है.. 

जन्म से..।

भूल अब शिकवे गिले.. 

छोटा है तूं

मत मार खा, मेरे यार 

मुझसे..

आ एक बन, मेरे साथ, रह..

ग्यारह हैं हम, तेरे साथ मिलकर..

फतह अपने साथ होगी, 

हर सतेह पर

चल हिंदोस्तां के गले, मिल! 

आ खुशी के ज्वार में मिल! 

जय प्रकाश मिश्र 







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