आज तक तो पीटता था, तालियां..चुप है क्यूं!
आबे-बयार : आज दुष्टों के नापाक कारनामों के चलते, देश को कठिन कदम उठाने पड़े हैं। इसमें कुछ नापाकों के मौत की खबरें भी आईं हैं पर जो दुर्दांत आतंकी, नहीं अपराधी कहें उन्हें, भारत में ऐसी ही हत्याओं पर मुस्कुराते थे, वे आज दिल से रो रहे हैं। उन्हें जानना चाहिए, हर शहरी या इंसान एक जैसा ही होता है, कहीं का भी हो। हर शख्स किसी के घर का उतना ही अपना होता है जितना उसके घर वाले होते हैं। इसलिए ये खेल इन दुष्ट आतंकियों का सफाया करने के बाद अब बंद होना चाहिए इन्हें जल्द दोजख में भेजना चाहिए न कि आम जनता को नुकसान हो।
रंग-ए-दरियाए,
हुआ क्यों, लाल... यूं...
क्या कत्ल, उस जज्बात का...
हो... गया है,
आज..
यूं..।
क्यूं...
रो पड़ा वो..
देखकर! उस... दिन उन्हें..
जो पड़े थे, बस्तुओं से, जमीं पे,
मिट्टी बने, मिट्टी सने।
अरे! ये... तो,
खेल... ही था, रोज... उनका
मौत... के संग, खेलना,
एक खेल... था, नित्य उनका।
अब!
क्या हुआ?
वो खेल.. बस, क्या
दूसरों तक... के लिए, था!
पूछ उससे..., बोल.. उससे,
आज भी, वो खेल...
तो..., खेले न वो!
क्यों.. रो... रहा!
नामर्द सा...
आंसू.. बहाता घूमता है,
कह रहा है,
"मर मैं जाता" बेहतर यही था,
"मर मैं जाता" बेहतर यही था।
क्या हुआ है? आज!
क्यों...? परेशान है वो..!
इस तरह..!
मर वो जाता साथ,
क्यूं कर, कह रहा वो...इस तरह!
क्या कुछ अलग थे?
मांस के टुकड़े! वहां पर!
जो पड़े थे,
बहावलपुर के ......... में।
रंग कोई खास था क्या?
गंध कोई खास थी क्या?
दुर्गंध पापों की सनी थी
क्या? बॉस देती थी उसे... ।
क्यों उसे..
वे, आज, अपने से लगे!
पर, पहचान में आते कहां थे..
खून भी तो, लाल ही था,
फैला हुआ..
इतना, भावुक, आज वो,
क्यों, हो गया।
पूछता हूं?
आज तक तो पीटता था,
तालियां...
देखकर, हर लाश को!
आज... क्यों सिर पीटता.. है..
इनके.. लिए!
अरे! वे भी आदमी की जात थे,
बता उसको!
क्या हुआ भाई थे उसके,
परिवार थे..
परिवार तो वे सभी थे,
जो रो रहे थे
साल पहले... हिंदोस्तां में
दर्द में, ही बिलबिला कर,
तड़पते...,
तुझे, कोसते।
इसलिए, ले.. आह! उनकी
ले....
चख इसे..अब!
जरा, स्वाद तो ले! ठीक से।
कैसा लगा,
थोड़ा बता, मुझको
मुस्कुरा, जरा, आज भी, तूं,
उस तरह!
मुस्कुराता था, कभी तूं, उस समय!
नीच है तूं! मानव नहीं है,
भर गया तेरा पाप! अब तूं सैर कर...
चल अल्लाह के घर...
ना ना अरे! ना! दोज़ख में चल,
बत्तीस... हूरें..थूकतीं है, तेरे... ऊपर!
मुंह खोल.. अपना, स्वाद चख।
दोजख में रह! जहन्नुम में रह।
सौ साल रह... ।
जय प्रकाश मिश्र
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