बर्लिन विशेष: एक झगला प्रकृति ने पहना दिया है,
पृष्ठभूमि परिचय: मित्रों, जब तक मैं यहां बर्लिन प्रवास पर हूं, आप सभी को यहां की आंखों देखी कमेंट्री सुनाने की पूरी कोशिश करूंगा, हां सच्ची रहेगी, ये वादा है। यहां का परिवेश, पर्यावरण और सदाएं कैसी है इस समय, इस पर कुछ लाइने पढ़ें और सुदूर बैठे आप इसका आनंद लें। हरियाली जैसे गूगल-मैप में यहां दिखती है वह सच है। आगे पढ़ें, केवल आपके लिए..लिखा है इसे!
एक झगला*... प्रकृति ने..
पहना... दिया है,
शहर को इस...,
हरीतिमा* का.., झिल...मिलाता
हर तरफ..., बाहर से अंदर..!
फहरता.. है,
हवा में,
हल्का हरा.., किसी ओढ़नी.. सा,
नवो...ढ़ा* के पूर्व...
थोडी उम्र सी, किसी बालिका का..।
शीशम की पाती..,
हो... बुलाती,
हिल.. रही हों, झुर-झुराती..
सरिस* सी ही.., चुल-बुलाती
डोलती हैं.. पत्तियां...,
ताजी! हरी! मन मोहती..
हाय! मेरा।
कैसी.. कहूं...!
शिशिर-दुग्धा*, स्नान कर,
कोई साध्वी*, विमला-मना,
सामने, मेरे खड़ी हो
ऐसा समझ, बस, मौसम यहां का
इस समय, है चल रहा।
निर्मल हवा, रेशम सरीखी,
और पतली, काटती.. हो
चीरती.. हो, तन सभी का,
मन.. सभी का
कुछ इस तरह से, बह रही है
धार लेकर..
परम... शीतल.. कितना कहूं,
ताप है..
बस, दो.. ही डिग्री..
या और कम, कैसे कहूं..
क्या हाल है!
पर मीठी बहुत है, सुरसुराती
अमृतमयी* है।
स्वास कैसे आ रही है..
अहसास कैसी ढा रही है,
क्या.. कहूं?
पग.. बहुत कम.. हैं, सड़क ऊपर..!
कुछ रास्ते.. हैं, अजब पर!
ये कुंज.. हैं, या पुष्प के संभार.. है
इन्हें क्या.. कहूं!
धरती छुए, आपाद मस्तक..
झुके.. हैं, लदे... हैं,
क्या... खिले हैं
भारी.. हुए हैं भार.. से
पराग.. के;
घनेरे.. हैं, पर कीट की ये पहुंच से
अति दूर.. हैं
पोस्टर से लगे हैं, ये हर किनारे
स्वप्न.. पथ पर,
सच प्यारे बहुत हैं।
जय प्रकाश मिश्र
शब्दों के अर्थ:
झगला*... ढीला ढाला बच्चों का कुर्ता
हरीतिमा* का... हरे रंग की पत्तियों का
नवोढ़ा* के पूर्व... यौनावस्था के थोड़ा पूर्व
सरिस*, चुल-बुल.. शीशम की पत्ती सा हिलदुल
शिशिर-दुग्धा*.. कंपकंपाती दूध सी रंग वाली, चंपक चंपा सी
साध्वी * ... ब्रह्मचारिणी नारी
अमृतमयी* है.. कल्याण कारी, सुख देने वाली
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