क्या अलग है इन सभी में, हम सभी से ..

पृष्ठभूमि: मित्रों यहां बर्लिन में मुझे आज चार दिन हो गए और मैं इस शहर की आउटर सीमाओं  के काफी भीतर बनी "बर्लिनरिंग मेट्रो ट्रेन" पर पूरे बर्लिन का सफर भी किया, यहां के मुख्य स्मारक ब्रांडेनबर्गर-टोर के मुख्य गेट को भी देखा जो अठारहवीं शताब्दी का बना है और इन लोगों के  इतिहास की जीवंत कहानी कहता है। यहां वह चित्र भी देखा जो द्वितीय विश्वयुद्ध में इसके हार पर इसकी बुरी दास्तां बयां करता है और बिल्कुल पास में स्थित इसकी संसद और वहीं बगल में बनी सारे बड़े राष्ट्रों की शानदार इंबेसी भी देखी  पर मुख्य बात जो कहनी है, वह यह, कि एक भी पुलिस या मिलिट्री की गाड़ी, जवान, या तैनाती स्थल, या कोई रोक, रस्सी, चैकिंग विंदु, चैकिंग स्टाफ कहीं भी नहीं है। यहां की सुरक्षा कैसे लोग खुद सुनिश्चित करते है काबिले-तारीफ है। सुरक्षा पर कोई खर्च नहीं, घरों और शानदार अपार्टमेंट पर कोई अटेंडेंट नहीं, सुरक्षा गार्ड नहीं, घरों की कोई बाउंड्री नहीं, कोई ड्राइवर नहीं, सब काम लोग खुद करते मिले। इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ें और आनंद लें।


कुछ तो अलग है, इन सभी में

हम सभी से, सोचता हूं

ये.. लोग भी तो, आदमी.. हैं, 

और आदमी हैं.., हम सभी! 

फर्क क्या है! 

आदमी और आदमी में

सोचता.. हूँ!  खोजता.. हूं! 

दूर इतनी! बैठकर! 


विश्वास है, भीतर कहीं, फैला हुआ

एक सार सबमे, एक जैसा

कर्तव्य निष्ठा एक सी, 

सबके लिए 

है,

मतलब-परस्ती, बिल्कुल नहीं है।

देखता हूं, समय है, 

हर एक 

को

हर "एक की" 

दुविधा की खातिर! 

रुक गई हैं लाइनें, चुप सब खड़े हैं, 

देर.. तक, कोई बोलता तक, है नहीं।


जल्दी हो, कितनी.., 

समस्या.. कितनी बड़ी.. हो

अभ्यास है, संयम अनोखा, एक जुटता

साथ हैं सब, विलग है कोई नहीं।

इस लिए, एक सहमति है, 

शांति है, इस मौन में

सद्भाव है, 

पर्सनल कुछ भी नहीं।


पर अजब है, यह देश, मित्रों! 

मान लें.. 

"लोग" ही कुछ 

अलग हैं, हम... लोग से; 

भावना.. से, कर्तव्य के निज बोध से।

व्यवस्था.. सब मानते हैं

तोड़ते कोई व्यवस्था, किसी एक को, 

किसी विंदु पर, किसी मोड पर

सच सुनो! देखा.. नहीं।


एक भी, कर्मी-सुरक्षा, 

बैरियर, 

यहां... मैंने

आज तक, सड़क पर 

गली में, मेट्रो..., स्टेशनों पर 

सच कहूं...कहीं भी, देखा नहीं।

सब व्यवस्थित है, नियंत्रित है, चल रहा है

रास्ता किसी एक को भी, 

किसी एक का, रोकते.. देखा नहीं।


सड़क बिल्कुल साफ है, 

एक पन्नी भी नहीं, 

गुटका, मसाला, पान खाता.. थूकता..

आदमी.. मैने कहीं देखा.. नहीं।

आदमी.. तो छोड़ दें...

बोल दे कुत्ता.. कोई, किसी और का

किसी और पर...,  सच सुनो! 

यहां पर संभव नहीं।


तरस जाएंगे यहां, संवाद को

संवाद की भाषा यहां  पर मौन है

मौन है यह प्रकृति भी इन देश में

आंधियां तूफान तो बिल्कुल नहीं।

मोटर बसों के हॉर्न, इंजन मौन हैं

चीखते और गरजते बिल्कुल नहीं।

सॉफ्ट है हर चीज खुद में अलग है

कट्टरता अब यहां, देखने में है नहीं।

जय प्रकाश मिश्र




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