बर-खुदा! चाहत यही थी..
रंगत: आत्मघात एक क्रिया है, जो सभी संवेदनशील लोगों में होती ही है। इसे कुछ जीते हैं कुछ ढोते हैं और कुछ पार्श्व में सदा के लिए सहारा बना जीवन जीते हैं। हर शाम अपनी तन्हाई में इसी के साथ बैठ अकेले में जीवन को पैमाने में भर भर पीते रहते है। इसी पर चार लाइने पढ़ें। खुश हूं, आप भी खुश हों, कोई साथी तो मिला, ग़म बांटने को... मेरा हो या तेरा।
एक निराशा! सी भरी है
“बारी तक”..ब्रिम तक..
दिल… के कटोरे में.. मेरे..
बिन पूछे.. मुझसे
उदासी, लपेटे "ये" तन पे
चेहरे "पे" उतर आती है, हर रोज
शाम... होते होते..।
छुपाऊं कैसे... "इसे"..,
कब तक.. मैं,
यार मेरे..
आंखों से... छलक जाती.. है।
रुआंसी सी... तबियत!
हल्की करके...
धुंआ सा.. उठता है, भीतर.. कहीं
घुटता.. है, छा जाता है,
घनेरा होता.. प्रायः
काला सा हो जाता है।
करूं कितना... जतन...!
निकलता... ही नहीं।
क्या चीज है, ये...
बहता.. ही नहीं..!
निकालूं कैसे…! इसको अंदर से
सोचता.. रहता हूँ…
बैठ हर शाम...
बाहर एकांत… चुप!
खुद में बैठ अकेले..।
गुमसुम सा
अपने साथ बना, रहता… हूं,
देर तलक..
विचारों में…, मैं.. खुद में,
घुलता.. रहता हूं।
यादों की तेरी..,
मुख्तलिश.. चिंगारी.. फूट पडी हो
कोई , जैसे..
उचक.. जाता हूँ,
सूनी... हैं, आंखे मेरी…
सूखी..भी हैं,
देख न नम.. भी हैं, कैसे..!
कई बार सच कहता हूं
यहीं बैठे बैठे, हाथों से पुछीं भी हैं।
राह सूनी है,
जानता हूं, इस घर की, कोई.. नहीं…
आएगा,
फिर.. भी
राह.. किसकी
मैं इस डूबते.. सूरज, बढ़ते.. अंधेरे.. में
हर.. रोज तका.. करता हूँ।
यादें हैं, उभर... आती हैं,
अदा तेरी, रिमझिम उन बरसातों की
भीगना एक संग, कंपकपाना
नीले.. स्याह.. से अधरों के संग....
मुस्कुराना..
घनी सर्दी में, बे-स्वेटर,
बे-शाल हंसते, उछलते चले आना,
सब याद आता है,
आज भी वैसे ही अचानक
मुस्कुरा देता हूं, अपने ख्वाबों के अंदर!
लगा के पर... उड़ा आता हूं
तेरी.. बगिया के भीतर..
खयालों पर.. चढ़ कर.. ही सही..
जहाज उतरे.. जैसे
मंडराता...
धीमे... धीमे..,
मुकाम पर पहुंचने से पहले..
वैसे ही, चक्कर काटता बे-अवाज़
जमीं पर, मैं भी धीमे से उतर आता हूं।
छोड़ ये बातें सारी..
निराशा हैं मेरी..
पर गाढ़ी हुई जाती हैं... रे !
बर्फ सी जमती है…
मोटी हुई जाती हैं रे !
रोक दूं ?
यादों की ये... बहती नदी..!
कैसे... रोक दूं!
हरहराती उतरती है ये....
विकराल पहाड़ी नदी सी,
दिल के तल पर बहती.. है ये,
सीधे सीने पर मेरे ! क्यूं सरे शाम ... ये।
ले जाऊं कहां, रुकती ही नहीं!
खोजता हूं आज भी
तुझे वैसे ही।
रास्ता होता है, मैने भी सुना है!
यही तो चाहत है,
बर-खुदा, तूं बड़ा है
अब कोई रास्ता मुझे भी दे दे।
जय प्रकाश मिश्र
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