बहती रहीं, मेरी चाहतें! ऊपर से मेरे…

पृष्ठभूमि परिचय: हमारी इच्छाएं लताओं की तरह रात दिन बढ़ती ही रहती हैं और हम उनके नीचे उनकी छाया में आनंद और तृप्ति खोजते जीवन की गलियों में भरमते रहते हैं। पर एक उम्र आती है फिर विमोह और ज्ञान हो जाता है चीजें फीकी और रसहीन निरर्थक हो जाती हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

बहती रहीं, मेरी चाहतें!  

ऊपर से मेरे… 

आज तक, 

बादलों सी तैरती 

रंग भरती, रूप लेती,

क्षण क्षण बदलती, 

प्यास बन.. आगे ले बढ़तीं,  

जिंदगी भर!  

तृप्ति के भ्रमजाल रच.. रच..

झुलातीं.. थीं, झूलना, 

पर… अब नहीं, मुझे.. झूलना! 

ये झूलना.., ये झूलना।


एक सच कहूं! 

बहती रहीं, मेरी चाहतें!  

ऊपर से मेरे… पर..

मैं कहां था, साथ उनके! 

मैं खड़ा था, नदी बनकर! 

देखता अब दूर से..

रंग उनके, ढंग उनके..

और लोग थे… 

आते रहे, पास.. मेरे, बहते... हुए, 

जाने... ना कैसे, 

मिलते... रहे, 

समय के उड़ते... हुए, तटबंध पर.. 

बालुका... से बन रहे, मिट.. रहे 

क्षणिक रूपाधार लेकर! 

सोचता हूँ, आज अब..

एकांत में, मैं… बैठकर! 

”दुनियां ये क्या थी!“

बाहर… मेरे थी,

या चल रही थी, मेरे भीतर…! 

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: दरिया-ए-उम्र है, रुकती नहीं

उम्र.. थी 

बहती... रही, 

उन.. किनारों पर...

बढ़ती.. रही, साल की.. 

गांठें... लगाकर, साल में हर..

इसे रोकने की तलाश में, देखे हैं मैने…

लोग कितने, 

और कैसे! 

बन रहे हैं, खिलौना,

भटकते हैं..आस लेकर.. 

लौटते हैं, निराश होकर! 

पर बह रहे हैं.., आज भी

कल की तरह ही...

अरे! यह रुकती कहां है!  

किसी भी, तरह..

आजमा के देख ली..

कोई रास्ता, 

तुम ही बताओ, सुझा दो, 

गर जानते हो

रोक इस उम्र को, इस रास्ते को..

इस नियति.. को, 

इस परिणति... को

रोक दो परिवर्तनों.. को

नया रखो तुम हमेशा 

पुत्र को, पौत्र को, खुद को…., 

जगत को।

जय प्रकाश मिश्र

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