पेरिस जिसे यहां परीज़ कहते हैं, का यात्रा वृतांत सुने!
पृष्ठभूमि: अपने देश से बाहर निकलने पर बहुत सी चीजें बदल जाती हैं। लोग, सामान्य लोक-व्यवहार, चलन, वेश, पहनावा, और आदतें, भाषा, रंग ढंग सब पल भर में बदल जाते हैं। इसी बदलते परिवेश के दृष्टिगत आप मेरी यूरोप में की गई जर्मनी से फ्रांस की यात्रा का वृत्तांत पढ़ें।
विमान में
लोग तो वही थे,
पर सांवले और सांवले से काले
होते लोग, कम..,
गोरे.. ही, ज्यादातर... थे।
यात्रा पेरिस... की थी,
जहां के लोग... प्यार से इसे
परीज़ कहते थे..।
बहुत सुंदर है!
आर्किटेक्ट, और सौंदर्य
इस देश का सुना है! मैने भी यदा कदा!
कहते हैं
कभी, यहां के हारते..
राजा ने...
अपने दुश्मन से झुक.. के अनुनय
विनय करके कहा था
"यह परीज़ है"
यहां के लोग और
ये देश जहां में सबसे सुंदर है..
ध्वंस नहीं करना!
एक भी यहां,
न ही किसी से दुष्टता करना,
यह ऐसा ही बना रहे,
बस इतनी मुझपे कृपा करना।
मैं खुद और दुनियां, इसे ऐसे ही,
सुंदर, भोला, संगमरमरी,
भव्य, दिव्य
देख सके, इसकी दुआ करना।
मेरी यात्रा तो
बर्लिन.. से इंटरनेशनल..थी.,
लेकिन व्यवस्था और तेजी...
अंतर्देशीय फ्लाइट से भी कमतर थी।
थोड़ी ही देर में,
मुफ्त की...
ठंडी.."चीज" लगी... एक एक
स्लाइस और हल्की गर्म चाय,
पेश-ए-खिदमत तो हुई।
फ्लाइट, पूरी...
नखशिख.. भरी थी..
पर पंद्रह मिनट देर से उड़ी थी।
पब्लिक गुमसुम.., चुपचाप
लिए हर कोई हाथों में लिए लैपटॉप
कानों में इयर बड्स लगाए
अपने में समेटे दुनियां अपनी बैठा था।
पर! बच्चे तो बच्चे
एक से.. ही हर जगह जहां में होते
यहां भी वैसे ही गाते रोते..
मिले मुझको..
लेकिन संख्या में बहुत कम थे।
एयर होस्टेस तो दो थीं..
उनके बाल तो सफेद पर,
चेहरे पे खुशी थी
होठ, मुंह सीज़ंड, गुलाबी सुंदर थे।
कद बिल्कुल आदमी सा था,
हिलते, चलते.. अद्भुत थे
दूर...
बहुत दूर
सुदूर... आकाश से,
एयर.. फ्रांस की उड़ती उड़ान से
खिड़कियों के पार! कोई
देर से खड़ा था...
इस्पात का
एक मजबूत ढांचा,
पीठ... ऊपर उठाए एक टावर
शहर में बीचों बीच.. अकेला
अक्खड़ सा खड़ा था।
बिना पूछे, चुपचाप!
हजार फुट ऊंचा हूं, ताल
ठोंक ठोंक के...
मैं ही एफिल टावर हूं
मौन की भाषा में स्पष्ट कह.. रहा था।
उतरा नीचे...,
लैंड किया... वायुयान,
वाह!
क्या! विशाल..
हवाई अड्डा... था..
टर्मिनल तक आते आते
तीन तीन राज मार्गो के ऊपर बने
विशाल पुल पर
नीचे जमीं पर रेंगता
सात किलोमीटर से ज्यादा ही चला था।
लगता था, विमान
आम सड़कों के साथ
सम-लेवल पर ही एक साथ
चल रहा था।
वाह क्या बात थी
आप जहाज में, साथ दोनों ओर
चलती मोटर ट्रैफिक, नीचे
नजारा गजब था।
वाह! क्या भव्य टर्मिनल बना था
विशाल संरचना, नीचे, सर्पिल
सड़कें भागते लोग और मोटरें!
ऊपर ट्रस एयर कंडीशंड
विपुल.. तना था।
एक टर्मिनल से दूसरे की दूरी
आठ मील से कम तो नहीं थी।
बीच में दोनों के
बिना ड्राइवर
मानव रहित ट्रेन हर तीन मिनट पर
सिस्टेमैटिक चल रही थी।
जय प्रकाश मिश्र
इस एयर पोर्ट पर ही लिखा बहुत छोटा गीत
चलते चलते आपके लिए..
श्यामला... आ बैठ हम
बातें करेंगे
इस गुलिस्तां के बीच.. हम तुम
संग ढलेंगे, एक होंगे ...
दूर इतनी.. पा के तुझको
आज हम... आहें भरेंगे।
जय प्रकाश मिश्र
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