मासूम सी "यह"..! यहां कैसे... घूमती.. है

भावभूमि रंगपरिचय: इन यूरोपीय देशों में अपनी वही प्रकृति कैसी वेशभूषा में दिखती है, ऐसा लगता है जैसे अन-न-स्पर्श-कृत शुक-सारिका एक डाल से फुदकती दूसरी डाल पर चहलकदमी कर रही हो। मुक्ताकणों सी स्वच्छ, नर्म, विशुद्धा श्वेतांगी के गले में जाती "पान की लाल पीक"  जैसे स्पष्ट साफ दिखे वैसे ही प्रकृति के अंग प्रत्यंग उभर कर निखर आए हैं। और यहां की उदास शाम कैसे अपनेपन की भूरी खाल में शमा को लपेटती चली जाती है इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

मासूम सी "यह"..!  

यहां कैसे... घूमती.. है,

हर गली में, हर मोड पर, 

हर सड़क पर... 

साथ.. लगते, हर.. तिकोने.. पार्क की 

भरी.. पूरी.. 

वनस्पतियों के शिखर पर

खिलती लिली सी

मासूम सी "यह"..!  

यहां कैसे... घूमती.. है।


घर के बगीचों..., बाग.. में, 

उद्यान.. में, निर्जन वनों... में

छतों पर, 

ऊपर लटकते कंगूरों पर

दूर तक, फैले हुए, 

इन घास के, मैदान में।

बेदाग! सुष्ठुर... 

स्वच्छ.. निर्मल... विमल.. कैसे! 

मासूम सी "यह"..!  

यहां कैसे... घूमती.. है।


ओस भर भर, 

झूमते पेड़ के हर पात ऊपर

अनछुई, अन-न-स्पर्श-कृत 

शुक-सारिका सी डोलती है।

मासूम सी "यह"..!  

यहां कैसे... घूमती.. है


पुष्प... भी कुछ अलग हैं, 

सौरभ... झरे, तन मगन हैं,

कीट... कोई हैं नहीं... 

घेरें.. इन्हें... ,

जो सताएं, सौरभ... चुराएं 

हृदय का स्पर्श लें, 

उड़ उड़ उड़ें फिर बैठ जाएं।

कागजों की पंखुरी हो, 

शुष्क सी, चिपकी हुई, प्यारी रंगीली

ऐसे, इनके बदन हैं।

झलकतीं हर एक इनकी

नस, नाड़ियां हैं 

नवपत्तियों की, कोपलों की

कितनी मधुर हैं, 

ओस पोते होठ सी.. हिलती अजब हैं।

मासूम सी "यह"..!  

यहां कैसे... घूमती.. है।


जय प्रकाश मिश्र



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