ऐ मेरी बेखुदी ! तूं क्या करेगी !

रसरंग: सबमें एक विंदु होता है, थ्रेसोल्ड सीमा होती है सहने की, एडजस्ट करने की। किसी कारण से यदि यह पार हो जाती है तो उसके आगे फिर क्या जो बचती है उसे आवारगी कहें या दीवानगी ही होती है, जो मुक्त और बंधनहीन होकर, कैसी हो जाती है इसी पर कुछ लाइने पढ़ें आप आनंद मात्र लें।

ऐ, मेरी बेखुदी..

बेरुखी, ऐ रुखसती! आवारगी! 

तूं क्या करेगी ! अधिकतम.... ! 

छोड़ देगी सड़क पर.... 

मुझे... छटपटाता... अकेला... 

तड़पता..., 

अंजान पथ के मोड... पर..।

और मेरी... मुश्किलों... को, 

सामने.... रख, 

मुस्कुराकर..., हठ! ... करेगी,

तो...ये भी, 

सुन!  इससे आगे... 

और तेरी!  हैसियत क्या! कर सके तूं..!


दम... भरेगी, जीतने... का... 

सोच ले...!

क्यूं? 

छोड़ दूं मैं, खुदकुशी... 

कहने से तेरे...

और तेरे.. साथ... हो लूं! 

क्या... चाहती है, बता, तूं..! 

चल आगे बढ़, 

पकड़, मेरा हाथ..., मेरे.. साथ चल..।


क्या... समझती है! 

मैं..., तुझसे, .... डर.. गया

खयाल... था, वो...    बहुत... पहले.. 

अरे! अब.., वह! मर.. गया ! 


ऐ, मेरी बेखुदी..

बेरुखी, ऐ रुखसती! आवारगी! 

चल, मेरे तूं.. साथ...,  मेरे... साथ रह!

छोड़ सारी लज़्ज़तें, मेरे पांव.. पड़...! 

तूं जिंदगी का भाग है, 

चल जिंदगी के साथ रह..।


क्या... बचेगा, सोचता.. हूं 

बिन तेरे...

एक लाश होगी! पास... मेरे !

चलती.. फिरती, पांव.. पर, 

सब देखती, .... सबसे अलग! 


ऐ मेरी आवारगी! 

तूं प्राण है! 

तूं नहीं, तो जनम ही बेकार है! 

कुछ तो है, 

मेरा अकेला... इस जन्म में

तूं ही सही..

कोई सताए..., उल्लू बनाए.. 

प्यार में, दीवानगी तक...

और मुझको... 

शेष, अब क्या चाहिए! 


चल, दे रहा हूँ, 

जिंदगी..., तेरे, हाथ... में

आ थाम.. ले, मेरा हाथ, अपने हाथ में।

कोई... डगर चल, पर.. गजब चल! 

रास्ता हो...बीच से...,  मेरी चाहतो... का

तूं छोड़, मतलब!  इन सभी से

देख मत!  

सब छोड़ तूं! पार कर.., 

इस आवारगी... के पार.. चल।


दिल, भर... मेरा 

दिल की दरिया... पार कर..

क्या मिलेगा सोच मत, आवारगी है

तूं मेरी... 

बस आगे बढ़... सनक है तूं...

जानता हूं 

सनक... के भी पार.. चल..! 


आज, देखूंगा तुझे..! 

तूं, क्या छुपाए घूमती है, अंक अपने, 

जिसके लिए..

बदनाम हो कर रह गए...

मुझ जैसे बिचारे..हजारों, इस जगत में...! 

रस.. नहीं तुझमें है, ये मैं जानता हूं, 

वश नहीं तुझपर मेरा, मैं मानता हूँ! 

क्या कोई मंजिल है तूं, 

मंजिल नहीं!  फिर क्या ?  है तूं!  

आवारगी! तेरी..., हद.. पे क्या है? 

देखती है... 

तो बता! सब.. साफ कह! 


उस शिखर... पर 

उस.. शहर के

वह.. चमकता, क्या... रखा है,

पागल.  है दुनियां अरे! क्यों उसके लिए..

"जीत ली जिसने है दुनियां"... 

उसके मन में, क्या रखा है? 

देखना मै चाहता हूं...

आवारगी... है वो भी एक.. 

क्या? 

मैं.... तुझसे,  सुनना... चाहता हूं! 

एक शिखर, एक धरातल पर

भेद... सुनना चाहता हूं! 


नीचे, तूं आ...

मेरे पांव में पड़, 

पहन मुझको, गले लग

चल...,  धरातल पर... , साथ चल 

ऐ... शिखर..

एक... "मंजिल" तेरी.. मेरी..., 

साथ कह.., आवारगी की जद...में रह 

समझ सबकुछ, आवारगी... की हद में रह।

जय प्रकाश मिश्र



 




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