झिलमिलाती नदी सियने टावरे-एफिल ग़ज़ब था।
पृष्ठभूमि: मित्रों! दुनियां में कुछ चीजें कालजयी सी लगती हैं। एफिल टावर (1889) भी एक ऐसी ही मानव-कृति है। सिएना नदी के किनारे पेरिस में खड़ा यह केवल लोहे से बना एक हजार फुट ऊंचा टावर है जो सूर्यास्त के बाद अपने भीतर लगी सुनहरी रोशनी से नहा उठता है और हर घंटे पूरी रात पांच मिनट के लिए आतिश बाजी स्फूलिंगों से भर जाता है। सच में सुंदर दिखता है। इसी पर कुछ लाइने आप के लिए, आप पढ़ें, और आनंद लें।
शहर तो पारीज़ था..
मार्कोपोलो, बेबिलोनिया, होते हुए
आज नंबर..,
शेरे शहर.., टावरे-एफिल का था।
नदी सीयने बह रही थी
पास में,
पर बंधी थी..
पत्थरों के, रज्जुओं में, किनारों पे..।
नीलिमा...पहने हुए,
हल्की.. हरी, फानूस.. की
छाया हो.. कोई
पड़ रही हिलती अधर पे..
कुछ इस तरह का रूप लेकर,
वह बह रही थी,
वहीं नीचे।
वक्ष पर, इस नदी के...
आभूषणों... से, लदे थे...
सजे... थे,
स्टीमर... अनोखे,
कुछ खुले...,
कुछ वातानुकूलित..
सैलानियों से भरे.. थे।
रंग बिरंगे...अद्भुत अनूठे
मोटरबोट... कितने!
क्या कहूं!
सब...बहुत लंबे, कई तल्ले बने थे।
तेज इसको, चीरते...
अतिवेग.. से,
दौड़ते थे,
स्पीडो-बोट सुंदर.. पतले, नुकीले
सर्रे... मचाते, सुर्र... करते...
जलधार की रेखा... बनाते
लंबे.. लंबे.. चल रहे थे,
खेलते..!
सिएना नदी के साथ शिशु से...।
एक किनारे,
खड़ा, सब...कुछ देखता हो
वृद्ध कोई..!
घर को.. अपने, ठीक वैसे,
खड़ा था
टावरे... एफिल, वहीं पे..
शताब्दियों से..।
मौन! सबकुछ देखता..
खुश...मुस्कुराता
मुझे तो, वह दिख़ता था
दधीचि का कंकाल हो... कोई बज्र सा
मजबूत सुंदर हड्डियों का,
एक दम मांसल नहीं..
इस्पात का!
यह बना... है, सचमुच, निखालिस!
बेस नीचे चार हैं, कछुए सरीखे
जमीं पर, पत्थरों के सबसे नीचे।
हजार फुट...
ऊंचा...
उठाके सर.., खड़ा था
शख्स.. यह, मेरे... सामने..!
शांत था, अकेला था,
पर धैर्य से..
काल का यह... पारखी... था।
गर्व से यह भरा था..
समय के पर चढ़ा था
सभ्यताएं..
सभ्यताएं कई..., देखीं
बदलते परिवेश कितने...,!
पर देखता यह.. खुद के नीचे..
मुग्ध था!
सिएना नदी पर!
एकटक.. उसे रातदिन, निहारता है
पास से, पर बहुत ऊंचे....... !
झिलमिलाती, लहर लेती,
केलि करती देखता है
आज भी...
उसे... ठीक वैसे...।
लहर.. बन बन, रिझाती..
उठती.., च गिरती..
संभलती..!
नदी सिएना! प्यार लेकर उमड़ती
हर बार है!
तट पर बिचारी,
वस्त्र उज्ज्वल फेंक कर..
वीथियों में,
मणिगुंथी सी भंवर में
हो आ फंसी हो, मुझे लग रही है।
पर! बद्ध है!
यह टावरे-एफिल यहां पर!
किसी श्राप से, हिलता नहीं है,
आज तक! एक भी पग!
प्रेम इनके बीच बन, हम सब खड़े हैं
देखते हैं, नेत्र से, इतने सटे हैं
पर मिलन... से
ये दूर हैं, शताब्दियों से।
इजहार कैसे कर रहे हैं लोग!
इनके बीच आकर
देख लें, एक बार
मूर्ति है ये संगमरमर के ढले..
सुंदर.. मधुर मधु.. में पगे,
नेत्र हैं अति.. स्वच्छ, निर्मल पुष्प से
कोमल.. त्वचा है,
अभ्रकों.. से मिल बनी हो
श्वेत.. हैं ये रूप.. अद्भुत!
परी.. ही हैं पारिज़ा के।
बोलती ये मूर्ति हैं
खोजता!
देखता यह संस्कृति
स्तब्ध हूं, मैं
खुलापन है
झलकता हर ओर से।
डूबता हर जन खड़ा है उसी में।
एक सच कहूं! देखा है मैने !
आंख से खुद!
पास इसके,
दोस्तों को, दोस्ती का..,
प्यार को हर, प्यार..का
सौंदर्य को, निखरेपने का
मस्त को हर... मस्तियों का
कसमें खिलाता
सामने! गवाह सा! उनके हृदय का
सच्चाइयों का, पवित्रता का
भार लेकर खुद खड़ा है।
झिलमिलाती नदी सियने..
साथ लेकर
टावरे-एफिल एफिल गज़ब था।
जय प्रकाश मिश्र
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