स्कर्ट.. सी पहने हुए ये शहर, पेरिस!

पृष्ठभूमि: यूरोपीय देश फ्रांस और जर्मनी की यात्रा के दौरान यहां की सभ्यता और अपने देश भारत की सभ्यता की तुलना करने पर अंतर वैसे ही है जैसे पवित्र सांवली भस्म और सफेद सामान्य राख में अनुभव किया जा सकता है। एक अनवरत विशुद्ध और उत्तरजीविता के लिए कल्याण कारी है और दूसरी देखने में जलती आग सी, लुभावनी और तत्क्षण बनती राख है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। 

कैसे मिला दूं!  

राख... को, इस.. पास... रख दूं, 

एक ही... उस पंक्ति.. में

जिसमें रखी है, 

भस्म... यह, पावनमयी! 

अरे! यह तो शक्ति... है

यह, तपोनिधि... है, 

यज्ञाग्नि.... से निकली हुई,

कल्याण निधि... है,

मान तो।


सहती हुई, जाने न कितने 

चक्र-भीषण, विधाता के।

दशक से, शतक से 

ना.. ना.., न,  ना.. रे 

अनगिनत शताब्दियों से।


पर, मान मेरी, 

राख! यह... बस तात्क्षणिक है।

स्व-परिणिति है, 

क्रिया की... 

न... कि, काल.. की

तत्व की.., एक अवस्था है, 

बेशक जली है, आग सी, 

चमकती 

देखने में... गर्म है, यह अभी, 

पर! लकड़ी ही है, गुण वही 

डी एन ए वही ...।


भस्म! 

अरे! भस्म में... एक मूर्धना है! 

भावना उसमें घुली है! 

पवित्र सी..

माथ की वह वस्तु है.. 

राख से ऊपर बड़ी...।


आज ही, मैं देखता हूँ, 

अरे यह! जो राख है...

उड़.. रही है, मिल... रही है, 

अनर्गल में..

भस्म से यह निम्नतर है,

नीचे बड़ी।

हमसे अलग है

सौंदर्य.. इसका, अलग है

इस, राख का, 

मोम सी यह मुलायम, निष्ठुर अधिक है

हवाओं में पली है, उजली बडी।

 

स्कर्ट.. सी पहने हुए ये शहर, 

छोटा, 

और...  थोड़ा

सोचते हैं आप, जितना.. 

मुश्किलों में

उससे भी छोटा..., 

मानसिकता.. 

कुछ उस... तरह, लेकर बना है।

रेशम सा बना है, 

फिसलता, चमकता

निष्ठुर, मतलबी, गुलाबी रंगत लिए 

मुंह, होठ पर, मुस्कुराता

जबरदस्ती हंसता... हुआ।

पर! मजबूत है हर शख्स, 

चलता और फिरता

स्वावलंबी... ये तो सच है।

जय प्रकाश मिश्र


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