परिंदों सा, फूल सा, तितलियों सा आदमी कैसा।

पृष्ठभूमि: आदमी नामक नस्ल की, ये अक्ल और उसकी स्वार्थ की भावना उसे कितना गिरा देगी, वह मानवता ही नहीं, क्या सहअस्तित्व की मूल भावना को भूल आपस में लड़ मरेगा। यह भयाक्रांत करने वाला प्रश्न है। न्यूक्लियर शस्त्र जिस दिन प्रयोग होगें क्या होगा?  दिन दूर नहीं दुनियां इसे देखे और पश्चाताप के आंसूं रोए। आदमी को बड़ी अक्ल और शक्तियां ईश्वर ने दी और जिम्मेदारी भी दी थी। पर हम अपने में एक न हो देश, जाति, नस्ल, कौम में बंटते अपना बंटाधार करते जा रहे हैं। इस पर अन्य जीव जंतुओं के विचार सुने। आनंद लें।

शांति.. है, अब! 

बारूद.... था, कल!  

निनाद.... था, गूंजता हर ओर

कैसा..!  

हहर... करता,

धमाकों का, ब्रह्मोस का.., ड्रोन का।


कल तक यहां..  

प्रतिकार... की, प्रतिध्वनि,

भयानक.. गूंजती थी,

आदमी.. सहमा हुआ था, 

महक थी बारूद की।


हवाओं... में, बेबसी थी, 

हवाएं बेज़ार.. थीं।

अब! बह.. रही हैं, पर डर रही हैं....

क्या कहीं कोई.. छिपा है ? 

सोचतीं.. हैं।


उड़ रही, सिहरतीं, 

इन तितलियों से पूछती हैं..

क्या हुआ था?  

क्यों आदमी विक्षिप्त... था, 

पागल.. हुआ था, 

एक हफ्ते... से यहां,

हल हो गया! 

हल मिल गया! हर समस्या का..।

जिसके लिए वह... लड़ रहा था

क्या शांति.. अब यह कायम रहेगी? 


फूल, चुप! सब सुन रहा था, 

एक चिड़िया.. बहुत छोटी..

उड़, तभी... 

नजदीक आई, 

मूक.. बैठी, सोचती..है

काश!  ये ही.. सत्य होता...

आदमी... मिल जुल के रहता

परिंदों सा, फूल सा, तितलियों सा 

बन... के रहता 

भूल जाता, तेरा मेरा, आदमी

वो....

हम सभी सा, एक हो, एक संग, 

जीता.. च मरता।

जीत लेता, जहां को, 

जीव... हर, खुश... हो के रहता। 

जय प्रकाश मिश्र





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