जर्मनी... एक दास्तां-ए-व्यवस्था अजबो गजब!

पृष्ठभूमि: दूर देश जर्मनी (बर्लिन) में आना हुआ। अलग है यह परिवेश। जो चाहिए वही रहेगा, अवांछित कुछ भी नहीं, न कीड़े मकोड़े, मक्खी, मच्छर, कुत्ते बिल्ली, कोई जानवर सभ्य या असभ्य सबसे पूरी तरह मुक्त यह भूमि। सभी वनस्पतियों का प्यार भरा साथ, विशुद्ध सुंदर हरियाले पेड़, सुंदर पुष्प, निर्मल पत्ते, धुला धुला वातायन, निर्मल स्वच्छ हल्की हवा, एक भी आवाज नहीं, प्रशांतित शांति। दौड़ भाग, महत्वाकांक्षा से दूर संतुष्ट! सुखी जीवन! पर दड़बों में बंद। मतलब से निकलना और राष्ट्रीय पेंशन पोषित लोग अपने में मस्त आपाधापी से अलग दुनियां है यह देश, आबादी बहुत कम। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें आनंद लें।

शालीन, सभ्य, 

चलन.. बेशुमार गजब

रोक एक भी नहीं, सीमा से ऊपर

उठ कर...

सब नियंत्रित, कंसील्ड यहां

सदियों से, जीवन...

प्रकृति मुक्त बिहरती है.. 

घरों के आंगन में

आगे... पीछे, ऊपर नीचे,

जिनकी जरूरत नहीं... 

वो हैं ही नहीं...

जो... हैं 

वो जरूरत से.. कम ही सही।


विरासत संजोए, 

अठारहवीं... 

सदी की, चारों तरफ

साम्राज्यवाद की नुमाइश पहने...

गहनों सी...अलबेली, अप्रतिम 

बिल्डिंगे शमोए.. भीतर अपने 

खड़ा ये शहर, 

देखने में अच्छा है...

सुंदर पोशीदा... लबादा पहने, घुटने तक

देखने में अच्छा है।


ओरिजनल की छाप, पक्की है यहां! 

डुप्लीकेट, कुछ भी नहीं

पक्के हर रंग, 

सजाने को, रंग कच्चे, 

खोजे तो, पाए एक नहीं।

एक... सादगी है, जीवन में

हलचल... कहीं भी नहीं,

तेज रौशनी, चकाचौंध 

कही.. भी देखने को, मिलती ही नहीं।


बर्लिन... है ये, 

राजधानी... है, इस देश की

पर फ़जूल खर्चगी, एक भी, 

खोजने पर भी, कहीं है ही नहीं।


शाम का वक़्त है, 

सात.. से ऊपर हैं सूइयां 

पर शाम....! 

बिल्कुल भी नहीं, 

अभी तक, मैने..., देखि.. यहां।


आवाजाही बेशक कम.. है, 

शांति है सड़कों.. पर,

व्यस्त हैं, लोग अपने में 

फुर्सत किसी को भी नहीं

भीड़! क्या होती है?  

इस पूरे दरमियां, मैने देखी ही नहीं।

 

लौटते लोग.. 

अपने यहां जैसे... बोझ.. में, 

दबे.. दबे.. से नहीं, 

फूल.. से ताजे.. हैं, 

खिले.. खिले..चेहरे सबके ..

लोग सब, सचमुच सादे हैं..।


किसी भी जज्बात की 

यहां..., 

कोई बात.., बहस ही नहीं! 

सभी मिल-जुल कर, खुश हैं

बाकी कोई और बात नहीं।

कौन!  कौन है? 

कोई पहचाने... क्यूं! 

सच! कहूं तो, 

जिंदगी... जीने के लिए 

प्यारी.... सौगात, है यहीं..।


बिल्कुल...

खाली, खाली सा... 

शहर, 

हल्की हल्की है हवा

निर्झरणी.. वातायन, 

प्यारी बहती है यहां।

काम.. का, कोई बोझ.. नहीं, 

अपने रव में, चलती है, 

सबकी... जिंदगी, 

शोर-ए-गुल... तो बिल्कुल... 

कहीं.... भी, 

है.... ही... नहीं! 

आवाज चिड़ियों की, बच्चों की 

मीठी मीठी

सुनता हूँ कभी कभी... कहीं-कहीं

कुत्ते भौंकते ही नहीं, 

ट्रेंड हैं, वाजिब कैसे

हमारे यहां जैसे, लावारिश 

खोजने... पर भी, मिले एक नहीं।


उदासी की सीमा पर बैठा, 

ये शहर

बाहर से गुप, चुप-चुप है, 

पर जागता है 

भीतर 

कहीं 

सजग सीमा तक, चौकन्ना बिल्कुल है।


यह देश है, 

जर्मनी..! मित्रों

उदास, लोग नहीं, पर उदासी है यहां

मतलब से, आते जाते, लोग केवल 

शर्गोशियां हैं ही नहीं, 

नहीं एक यहां।

किताबें मोटी.. पतली

आज भी 

वैसे ही.. हाथों में लिए

पढ़ते.. जाते, चलते, फिरते, 

बैठे सीटों पर

साथ लिए... बसों में, 

ट्रेन में, ट्राम में, एक जैसे लोग, 

मिलते है यहां।


उदास...उदास,  पुराना...पुराना 

सिला.. हुआ, सौ साल.. पहले का 

राजसी वस्त्र हो कोई

प्रच्छन्न चिर नवीन! 

पर... हर कड़ी से, 

हर... कड़ी मिलती हुई, 

प्लेन हो या ट्रेन, ट्राम हो या ट्रैफिक 

व्यवस्था बिल्कुल चुस्त... दुरुस्त।

समय की कठिन रस्सियों में बंधा

हर एक क्षण, 

क्षण से बंधा, सिस्टम से जुड़ा।

अद्भुत अनोखा, 

शहर देखा, देश देखा, 

सुस्त... 

बे हलचल, 

टालस्टाय की, कहानियों का, 

रोल... खेलता एक प्यारा मंचन देखा।

मजबूत हड्डियों के ढांचे को पहने

दानेदार, अडिग, सुष्ठ तन देखा।

सबकुछ व्यवस्थित, 

गियर के चकनट सा चेन पर चलते देखा।

सदियों पहले का बना

आज भी इस धरा पर

हर तरफ... फैला, 

अच्छे से प्रयोग होता

पूरा वर्णनातीत सांसारिक प्रसंग देखा।


लोग हैं, घरों में बंद, 

बिल्कुल नहीं दीख़ते यहां, 

बेवजह घूमते बाहर,

पेड़, पत्तों, नदियों का राज है 

यहां के आदमी के ऊपर।

खुश है प्रकृति, खुश है जमीं

खुश हैं चिड़ियां सारी

पर नहीं एक भी अवांक्षित कड़ी

देखने को मिलती यहां।

जय प्रकाश मिश्र




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