हेलसिंकी सुंदर बादलों का देश देखा!
परिवेश परिचय: हेलसिंकी फिनलैंड की राजधानी एक छोटा सा पड़ाव मेरी मुख्य यात्रा का था। चार घंटे मात्र रुकना था यहां। वहां मैने क्या देखा उसे शब्दों में रखने की कोशिश करता हूं आप पढ़ें और आनंद लें। आंखों देखी ही लिखी है।
हम आ.. गए हों…
बादलों.. के देश… में
मुझे… लग रहा है,
हम आ गए हों
शांति.. के परिवेश में,
मुझे लग रहा है।
सघनतम, विरलतम, हरिताभ आभा
नवलिमा.. ले सिरों पर,
तिकोने..., दूर तक फैले.. हुए,
वृक्ष के.... इन झुंड में,
जनशून्य, सुंदर देश में,
मुझे लग रहा है,
निखरी हुई हो प्रकृति आभा
विस्तीर्ण तक, फैले हुए, इस देश में
हर अंग में, हर रूप में
मुझे लग रहा है।
किस वेश में, किस रूप में,
परियां…यहां हैं,
विचरती
देख कर..
मन भर गया;
प्रभा हों निज चंद्र की ही,
रूप धर कर घूमती
देख कर..
मन भर गया।
कोमल मुलायम
झर रही हो, स्निग्धता, हर अंग से
मुझको लगा,
जस निकलते नव-करील हों
बंसवार के...
उत्स भर भर, और ऊपर
और ऊर्जित... सबसे ऊपर...
खिंचते.... हुए..
सजीले...,तनते हुए से, सलोने..
एक से बढ़ एक..
आगे
शरीर, ऐसे सुघड़तम…
सुंदर, छरहरे!
देख !
कर..
मन भर गया।
सूरजमुखी के फूल.. हों
एक जैसे,
चमचम... चमकते,
विद्युतिक, अद्भुत छड़ीले,
पुष्प.. हों
खिलते.. हुए
हिलते हुए, नव डालियों.. पर
देख कर..
मन भर गया।
बादलों की छांव में थे, तिर रहे हम
मुझको लगा, ऐसा यहां!
सच! फुदकते,
सुर-सुर सरकते, मेघ थे
हर ओर मेरे।
सिर.. के ऊपर, छा.. रहे हैं
नीचे.. हैं कितने, पास..इतने, आज मेरे,
क्या.. कहूं!
पकड़.. लूं, इन्हें हाथ में, खेल.. लूं,
बात.. कर लूं, चाहता हूं।
रूपहली
क्षण में बदलती
भृकुटि रेखा, बरबस लिपटती
इन शीतली सी बदलियों की
अजब है, मैं क्या कहूं।
रूप का श्रृंगार, लेकर प्रकृति है
चहुंओर फैली, शांति से
हवा कुछ हल्की यहां है
पेड़ सारे तिकोने हैं,
बालकों से चुप चुप खड़े है,
देखते हैं सभी को बड़े ध्यान से।
एक क्षण में बांधते हैं
लोग... कैसे!
हेलसिंकी.. इस बात में, सच अलग है।
एक स्लोगन विशिष्ट था
लेकिन वहां..
आप हो कहीं के भी इस धरा पर
पर कहानी आप की,
आज ही, आम होगी, इस विश्व में
पूछता हूं आपसे
ऐसा क्यूं लिखा है! हर तरफ प्यार से।
जय प्रकाश मिश्र
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