क्यों ... हम, तुम..को, बुलाएं ऐसे....?
पृष्ठभूमि: आजकल प्रायः देखने में आता है, लोगों में छोटी-छोटी सी बातों पर, या फोन पर हुई नोक झोंक में बात इतनी बढ़ जाती है कि पुराने तो दूर ताजे-फ्रेश रिश्तो में तनाव और खटास आ जाती है। इसका प्रमुख कारण शायद इतनी आसानी से और बार बार, दूर से ही, हर तरह की बात करना और प्रॉपर रिस्पांस की जगह तत्क्षण अपने अपने परिवेश अनुसार प्रतिक्रिया देना ही है। बात बात पर रूठना और मन में गांठे बनाते रहना इसी का परिणाम है कि आपसी प्रेम में कमी आ गई है। पहले के समय किसी से भी सीधी बातें और "फेस टू फेस" सामना होता ही नहीं था, और एक भी बात करने को, लोगो को आना जाना पड़ता था, तरसना पड़ता था, अतः अनावश्यक-ओछी बातें होती ही नहीं थीं, इस कयास की छाया में शायद जीवन में ज्यादा मिठास रहती थी। एक दूसरे को कल्पना के परों पर बैठ सोचते थे और भाव जगत में खुश रहते थे। इसी पर कुछ अटपटी.. पर यथार्थ.. लाइने पढ़ें, और आनंद लें।
क्यों ... हम!
तुम..को! बुलाएं ऐसे....?
बात... करें, दूर... से, इन फोनों पे... ?
चलो,
थोड़ा, सब्र... करें,
एक अरसे... बाद... मिलें,
पर.. जब... भी मिलें,
मिलने की तरह..., तो.... मिलें...।
क्यों ... हम!
तुम..को! बुलाएं ऐसे....?
बात... करें, दूर... से, इन फोनों पे... ?
दिल.. को धड़कने तो, दें...
अहसास...कहीं उगने तो दें...
कुछ दिन.. दूर... रहें,
हम... तुम, अपने.. से,
चलो.... यादों के, झूलों में झूलें
सपनों.... में जिएं... !
क्यों ... हम!
तुम..को, बुलाएं... ऐसे....?
बात... करें, फोनों पे... ?
बिन.. बताए....
ही तुझे...तेरे घर... के,
पैदल... रस्ते पे, किसी मोड, रुकें.!
सिरफिरा.. आशिक हो,
जैसे कोई...
ऐसे..अंजान मुसाफिर... बनकर
अपनी... मुलाकात से पहले...
की तरह.., तुझको
छुप छुप, आते जाते देखें...!
क्यों ... हम!
तुम..को, बुलाएं... ,!
क्यों बात... करें, फोनों पे... ?
उन्हीं...
रस्तों पर बैठें..,
वैसे ही अकेले.. बैठें!
अंधेरों... में आते-जाते... तुमको
छुप.. छुप.. कर देखें।
बैठ... वहीं, देर... तलक
तुम्हारे खयालों में.... डूबें,
इंतज़ार... करें,
कल्पना के "पर" ऊपर बैठें,
खोये खोये, से रहें,
आहें भरे! राह तकें!
घंटों... घंटों.. धूल सने, तेरा
इंतजार करें।
क्यों बुलाएं! तुम..को ...
हम...ऐसे?
बात करें, फोनों पे... ?
देखें... उम्मीद लिए...
आंख... लगाए बिल्कुल
रस्ता तेरा, आता.. अपनी तरफ...
धड़कते.. दिल को पकड़े..
कुछ कहने... को तैयार रहें..
एक एक परछाई... को
तौलें...
पास आती... अपने
तुझे ही उसको समझें...
उसी सब्र... से, उसी आदर... से
तुम ही जाड़ों में
उस कुहरे की, घनी चादर.. में
लिपटे हो! आते हुए...
कुछ ऐसे,
तुमसे मन के आंगन में मिलें
क्यों बुलाएं! तुम..को ...
हम...ऐसे?
बात करें, फोनों पे... ?
हर बार!
मन में उम्मीद! पालें तेरी!
तुम... ही, हो... अबकी.... !
मिलान... करें, गहराई से
उठते.. गिरते... कदमों को
हर हिलती डुलती चलती फिरती
यौवन से भरी तेरी काया से
कद.. काठी का, अंदाज करें।
उन्हीं... अहसासों में जिएं...
क्यों...हम,
तुम..को बुलाएं... ऐसे।
बात करें, फोनों पे... ।
तुम.. मुझको!
न... बुलाओ ऐसे!
न... मुझसे बात करो!
अब..आज, रुको...
आकर के मिलो, फोन को रख दो!
थोड़ा, इंतजार... करो!
आगे... से,
मेरी आहट.. को अंदाजों से पकड़ो
फिर मुझसे मुलाकात करो।
क्यों हम तुमको बुलाएं! ऐसे?
बात करें, फोनों पे... ?
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment