छोड़ कर घाटा, मुनाफा, सब वहीं धार अपने जिंदगी की बदल लें।
पृष्ठभूमि: आज कल एक व्यापक समस्या प्रायः वृद्ध जनों में और कुछ यंगस्टर्स में भी देखने को मिल रही है कि वे जिंदगी की सरसता से, माधुर्य से, उसके रचनात्मकता से किंचित परिस्थिति वश दूर हो जाते हैं। एक अनावश्यक नितांत निगेटिव विचारों का संघर्ष उनके भीतर ही भीतर व्यथित कर उन्हें तोड़ कर रख देता है। ततः उनका जीवन दया का पात्र हो जाता है। अतः स्वस्थ, प्रसन्न और लंबे जीवन के लिए, यह जरूरी है आप अपने वर्तमान के साथ और अपनी फिजिकल एक्टिविटी के साथ जिएं। मन की जटिल ग्रंथियों से निकलने वाली उलझनकारी विकारों से दूर रहें। इसी पर कुछ लाइने आप सभी के लिए प्रस्तुत हैं जरूर मनोयोग से पढ़े ।
बस!
सुपुर्तगी*.. . की चाह में!
और बेहतर!
दे सके ..वह, और आगे...
छोड़ जाए, बहुत सारा...
जीता... रहा वह, आज तक!
मरने.... से बदतर...!
और.... गर-तर! ही.. कहूं,
हालात... में,
अरे.... अब तक।
बस... साथ लेकर, एक मकसद...
इकठ्ठा, कितना! करूं!
मरने से पहले..
कैसे... करूं! किससे... लड़ूं!
भर.. सकूं!
असबाब, दौलत बांह भर भर,
पूरी अपनी, और ऊपर! सबसे ऊपर।
यही तो हैं, जी... रहे!
हम....!
सदियों.... से, अब.. तक!
छोड़ जाएंगे सभी कुछ, एक दिन...
हम, जानते... हैं,
पर कहां, हम मानते ... हैं,
इस लिए हम...
जिंदगी से दूर... हैं, कोसों यारों
जिंदगी... को हम कहां पहचानते हैं?
ढो रहे हैं, गठरियां हम भारी भारी
सर... के ऊपर..
उम्र... भर,
सच... उम्र भर! मैं देखता... हूं!
अपने.. ऊपर, तेरे ऊपर, उसके ऊपर!
झुक गई हैं गर्दनें, और झुक गई हैं
नजर अपनी...
आ गए हम पास... अब तो...
छूटने... को सरजमीं. .. ।
पर सोचते हैं!
और केवल.... सोचते हैं!
रह... गया क्या!
कितना बचा है? काम अब भी..
चिंतित हैं इसमें...।
छोड़ते हैं आज को,
आज के व्यायाम को,
सबसे जरूरी काम को...।
हमें.... चाहिए,
हम... स्वस्थ... हों!
सब कुछ से पहले
छोड़ सारी सुपुर्दगी को
छोड़ सारे काम को, दुनियांगिरी को।
व्यथित हैं बेकार.. ही
गुथित... हैं, संग्रथित.. हैं
परिवार जन की व्यवस्था में,
परिवार जन... आराम में...
पर थकित हैं!
अब उम्र... से, कुछ वृद्धता से...
शक्ति.. से, धन... धान्य से...।
अपरवश हैं इंद्रियों से, स्वास्थ्य से
आज की इस बदलती तकनीक से।
क्या करें, कैसे करें?
बस सोचते हैं!
रात दिन,
हर वक्त, केवल
....भविष्य के भवकाल को!
कर तो सकते, कुछ नहीं,
अब...
पर! बांधते हैं पुलिंदा!
सबसे... बड़ा
लादकर, मस्तिष्क पर! हम
ढो रहे हैं,
यारों, इसको रातदिन।
यह सोच!
हम पर, विष..से बदतर,
काम अपना.... कर रही है,
कितनी....बारी, कितनी भारी...
हाय! हम पर पड़ रही है
तुम ये जानो!
समय के संग! डूबते हम जा रहे हैं...
अवसाद.. में! सच है मानो!
हम जानते ही, हैं नहीं...हम
किनारे पर किस.. खड़े हैं
बस कगार.. है ये आखिरी,
गिरने से पहले..
बात मेरी मान लो।
बात मांनो मेरी , तुम सब..
इस उम्र.. में, इस ठांव... पर,
यह "सोचना"....
अविरल, बराबर,
अकेले एकांत में, अन्तस में भीतर
और बैठना इन उलझनों संग
भारी पड़ेगा एक दिन!
भारी पड़ेगा एक दिन!
तार... हैं जुड़े,
भावना... के, बहुत गहरे..
मस्तिष्क में, आपके,
आपसे..
लोड... उन पर संयमित.. दो,
टूट... जाएंगे नहीं तो, एक दिन!
छोड़ देंगे साथ तेरा एक दिन!
मुक्त हो जाओगे सबसे.. एक दिन!
लोग पछताएंगे तुम पर एक दिन!
बात बिल्कुल व्यक्तिगत, मैं कह रहा हूं!
आप कृपया ध्यान दें,
आप यदि असमर्थ हैं, परेशान है,
किसी बात... से, किसी समस्या... से
अंदरूनी... तौर पर
और रास्ता कोई है नहीं
तो...
रास्ता... ही बदल लें,
छोड़ दें बहती नदी... को, साथ उसके
घाट, अपना बदल लें।
और उम्र में यदि जवान हैं तो,
शक्ति अपनी भूल कर
बुद्धि से ही काम लें,
भूलकर भी... रिवेंज.. लेना छोड़ दें।
छोड़ कर घाटा, मुनाफा, सब वहीं
धार अपने जिंदगी की बदल लें।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment