आज के नेता और उनकी दुनियां।
भाव: आज संसद को देखा तो रहा नहीं गया और लिख ही उठा। आप भी पढ़े और आनंद लें।
लग... रहा था देख... कर,
यह.. युद्ध का आगाज.. है,
नायक.. खड़े, दोनों तरफ.. थे
मुट्ठियां.. कसते.. हुए..
पर, भले.. थे, वे
आक्रोश... ले, आगोश.. में
बस! लाल पीले.... हो रहे थे।
मैदान हो वह युद्ध का
हर तीर को वे.. तौलते थे,
जो चल रहा था विपक्ष से
प्रतिकार उसका कर रहे थे।
जी नहीं!
भूखे... नहीं थे, तृप्त थे वे,
हर तरह की आब से, संतृप्त थे वे
सुबह से ही आज, वे सब
बहस करने.. जम... गए थे।
वातानुकूलित... कक्ष था,
शीतल... बहुत था
शांति... थी हर ओर बाहर...
विपुल फैली सुरक्षा थी...उन सभी की
देखने पर लग रहा था।
पर,कहीं... कुछ, जल... रहा था!
भीतर... कहीं कुछ, तप... रहा था।
निकलती बौछार थी,
वह बोली नहीं थी
शब्द थे तीखे...,
कि बस, गोली... नहीं थी।
अंग... सारे फड़कते से लग रहे थे।
कुछ... कह रहे थे,
कुछ... अनोखा...
परिणामातः
मेज... भी कुछ, बज.. रहे थे।
गजब था सब हाल! मैं कैसे कहूं!
एक दूसरे को
झूठे हैं वे..
वे सब..
आपस.. में ही कह रहे थे।
संसद.... थी ये!
सबसे बड़ी... इस देश की!
आत्मा... थी! देश... की!
लोग इसमें, बैठ कर,
कुछ खड़े होकर!
बात अपने हृदय की, आत्मा की
एक... ना!
बात अपने पार्टी.. की रख रहे थे।
बात सारी... पार्टी.. की रख रहे थे।
कुछ भयानक शब्द ले.. ले...
जाने न क्या.. क्या.. कह रहे थे
शेष, थे ताली बजाते,
हुड़दंग जैसा कर रहे थे।
हश्र सारे जानते थे,
ये जानकर मैं चकित था
पर युद्ध था, ये दिखावटी
और सारे लड़ रहे थे।
बात... कोई एक दो,
अंतरात्मा की
बाह्य मुख से कर रहे थे!
खुद चढ़े थे पार्टी की नाव अपनी!
संजीदगी से! चिपट कर! चिपके हुए...
दूसरों... से,
नाव... अपनी छोड़कर,
वह उतर.. आएं,
साथ उनके...
छोड़ सारा राज..., संग प्रासाद...
सुन उनके... अंतर्रात्मा
की आवाज..
उससे....
उतरने को कह रहे थे।
मै खड़ा था बीच उनके
देखता था!
इतने भयानक युद्ध में
वे बीर ही थे,
जो बाहर निकल कर बरामदों में
किस तरह... से हंस.. रहे थे,
विरोधियों से! प्यार से!
वे मिल रहे थे।
मामला सारा ये क्या है!
वे जानते थे, बस!
आ सकें डायस पे, वे
खूंखार.. लगते,
कैमरों में छप... सकें!
लोग देखें! मात्र उनको,
शौर्य उनका, उस हाल में
शब्द उनके भेदते
सुन दहल जाएं लोग सारे...
वोट.. उनका एक भी ना
छटक जाए...
बाहर कहीं पे...
यही चिंता सताती है इन सभी को।
हश्र सारे जानते है इनं बहस की,
दर्ज हों, छूटें नहीं ये,
इसलिए थे पोंछते, रुक रुक पसीना
बात ये सब..
बहुत लंबी कह रहे थे।
दर्द लेकर, जी रहा!
भूख का यह देश!
देखा!
घूमता है सड़क ऊपर
छटपटाता....
बालपन, यौवन यहां!
यह रूप देखा...
जाने कब से... !.
गंदी हो कालर एक की,
इन सभी में से किसी की..
आज तक! सच कह रहा हूं!
मैने न देखा!
वर्ष हो गए पछत्तर,
कैंटीन में इन्हें देखता हूं
छक के खाते!
क्या कहूं, किससे कहूं,
कैसे कहूं!
इतने दिन से! ये ही तो हैं!
जो आज तक भी चल रहे हैं..
देख कैसे
बीमार! जनता को उठाए हाथ पर!
कंधों पे अपने!
ऊपर ये अपने, उसी हाल में,
स्वतंत्रता की प्राप्ति से.. अब तलक
किस शान से, बेशर्म होकर!
इन लंबी चौड़ी गाड़ियों पे, गर्व से।
जल रही जनता वहां है,
आग में झुल झुल झुलस कर!
और ये हैं, सेंकते हैं,
रोटियां, बस वोट की, इनके ऊपर।
दर्द इनका बड़ा है इस देश से
बहस सारे कर रहे है,
आज भी इस देश में, बस मेरे लिए।
जय प्रकाश मिश्र
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