अरे! वो...., छाया थीं मेरी,
आखिर... फ़ना,
इस उम्र.. में,
किसमें... वो होतीं!
शक है क्या ..? इसमें! तुझे
मेरी ही... थीं वो, सदा से
मुझमें ही... होतींं।
मत देख! मुझको,
आज ऐसे!
बादल... कभी था, तैरता... आकाश में..
भंवर था.. घूमता, ले डूबता.. था पार्श्व में..
अरे! वो, बदली... मेरी थी..
सांवरी थी,
पर, आब था, हर अंग उसके
झांकता था,
नर्तनी सी हिलकती थी
फूटता था रस, अरे! हर पोर उसके...6
बरबस... समझ, मीठी बहुत थी।
पर, तूं! छोड़ सारे राग, अपने
बस मुझको बता,
क्या उसे शंकर पे अपने! शक कभी था?
ये बता! तूं निडर होकर!
एक सच! बताऊं आज मैं,
सुन!
ध्यान से..
एक थे, हम यहां दोनों,
मगर हम ना! एक... थे,
एक ऊपर... था धरा के
एक नीचे..... बहुत नीचे, धरती पे...।
पर विपुल अनुराग था,
स्नेह का अंबार था
बीच में
एक सेतु था प्रेम का
हिलकता था हृदय में।
शिकायत.. किस...किस.. को थी
वो... फ़ना, मुझ...में थी
दिन... कितने... गुजरे
वो, लोगों... के थे,
हम तो वहीं, वैसे ही थे,
हिले न, थे।
आज भी हवा आती है, वहां
वैसे ही,
चूम लेती है,
खिलखिला कर हंस देती है,
यादों में, उन ही, जी लेती है
खुश्बू, वैसे ही, बिखेर देती है।
हम नहीं हैं तो क्या हुआ!
उलाहना किससे!
छाया... क्या मरती.. है...?
पूछना! उससे...।
एक करवट सी लेती है,
अंगड़ाई... लेती है
ये दौरे जहां की आदत है
मुहब्बत भी भुला देती है।
राज... मेरे थे, कुछ, पा,स.. उसके
इशारा.. उसका था
पर वो कस्तूरी... मेरी थी
गंध जिसकी, हवाओं पे चढ़, बरसती थी।
दूर... होती कैसे!
श्याम... थी! घेर.. लेती थी
शाम.. होते ही, आगोश.. में मुझको..
कहीं.. भी होऊं! किसी भी हाल.. में मैं..
अधरों से मुझको वो... सामने... सबके
चुपके से चूम लेती थी।
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