कोई बताए, पूछता हूँ? कृष्ण मोहक क्यों है इतने।
कोई... बताए! पूछता.. हूँ ?
कृष्ण, मोहक... क्यों हैं, इतने!
खींच... लेते, मन सभी.. का,
रसिक... जन तक, ठीक था..
ज्ञान-धन... जन, क्यों... उमड़ते।
इस तरह! श्रीकृष्ण, प्रिय पे
श्रीकृष्ण को, जब देखता हूँ!
सोचता… हूँ, ये नेत्र.. हैं,
या
बुलावना…है!
कैसा, निमंत्रण, झर रहा है
आह! शीतल नेह.. का,
मेरे लिए! मेरे लिए।
मुझे दे रहा है,
साख्य…! का यह भाव! अपना,
इतना गहरा !
उतरता है, हिय में मेरे,
बहुत.. गहरे! और गहरे।
झर रहा था,
किस तरह निर्झर झरा...झर..
झुरझुराता, प्रेम.. वत्सल!
नेत्र से उन!
डूबता मैं जा रहा हूं, बीच में !
खिल चुके,
महमह... महकते...
पंखुरी.. संग, झर..रहे,
पुष्प, के परिजात वन में।
जो खिले हैं, शीर्ष पर, सबसे अलग
सौरभ.. लिए निज होठ पर
छू रहे हैं,
अहा, मेरे, उभरे हुए अधरोष्ठ पर...।
मुदित मै, कैसा... हुआ हूँ
सोच कर!
आह्लाद में.. मैं घिर गया हूँ.
कृष्ण में मैं मिल गया हूँ,
श्रीकृष्ण में मैं मिल गया हूँ।
जो.. देखता था, रूप..!
उनका, ध्यान से
वह उसी… में, डूबता.. था।
लुट गईं थीं गोपियां,
संग लुट गए थे
गोप सारे,
पर, पेड़.. पौधे.. क्यों लुटे!
श्रीकृष्ण पर,
मैं सोचता... हूँ, आंख.... मूंदे!
बिलोकता, अंतर में अपने
सोचता हूं...एक किनारे..
क्या प्राणि थे ये?
पेड़ पौधे.. इसलिए
प्रेम इनका ठीक था.. श्रीकृष्ण से
पर! यमुना..., दीवानी क्यों हुई?
वह तो नदी थी!
क्या प्राणमय थी..!
एक होकर खेलती थी
खेल सारे.., संग उनके, किस लिए!
अब सोचता हूँ, ठीक कहते थे
पुराने लोग अपने...
गोप, गोपी, कृष्ण,
गैया, ग्वाल ग्वाले..
सब एक थे, श्री कृष्ण में,
एक बात बोलूं!
मान लो, जान लो, संज्ञान लो!
कुछ खास है, श्री कृष्ण में।
कुछ खास है, श्री कृष्ण में।क्रमशः आगे…
मात्र आपके लिए लिखा गया,
जय प्रकाश मिश्र
भावभूमि: अपनी संस्कृति में देवता नाम के देवता नहीं हैं, उन्होंने अपने कष्टसाध्य कर्म से सतत मनुष्यता की रक्षा की है, कष्ट सहा है, दुष्ट दलन किया है, तब पूज्य हुए हैं। चाहे श्रीराम, श्रीकृष्ण, या शिव कोई भी हों सभी ने मनुष्य जाति के लिए अपनो का और अपने स्वार्थ का हमेशा त्याग किया और प्रकृति के साथ रहे हैं। हमारे सभी देवता प्रकृति के भी रक्षण में सदैव आगे रहे हैं। वे सभी प्रकृति की गोद में पले बढ़े और खेले। श्रीकृष्ण हमारे सर्वस्वीकृत देव हैं, उन पर कुछ लाइने पढ़ें और भक्ति का आस्वादन करें।
जय प्रकाश मिश्र
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