रूप को अक्षरों में रच, कान से पर्दे पे सजा देता हूं।

भावभूमि: ग्रामीण परिवेश अद्भुत आनंदमयी होता है। अन्न से पुष्ट गेहूं और जौ की फसल अपनी मादकता पूर्ण सुगंध चहुंओर फैला देती है और खेतों में, सीवानों में विस्मरीकृत छटा छा जाती है। इसी प्रकृति की देवी के लावन्य और सुषमा पर कुछ पंक्तियां पढ़ें, आनंद लें।

आज देखा! 

रेंडने... लगी हैं 

जौ, गेहूं की फसलें.. ऐसे

उभर... आई हों, भुजदंडें, 

किशोर.. वय,  हाथों में जैसे।


बहती हैं बयार... 

गुदगुदी-गुदगुदी.., फागुनी.. फागुनी 

कुछ ऐसे, 

नच.. .. उठती हैं,

ग़दराई-गुदराई, इठल करती, 

बाली हों, बालियां जैसे।


लहर.. सी उठती है, 

सीवानों... में 

हवाओ.... की,  कैसे.. मंडराती

सीनों.. में, ज्वार उठा हो उत्साह ले..

नवेले, कुंवांरे... का  हो, ऐसे।


मन, हिलकता.. है 

सागर.. हो हिलकता, कोई!  

अतल... गहराईयों की 

गरिमा ले.. ले, 

किनारों पे..

हिलकोर करता है.. 

नटखट! 

जैसे, बादल हो 

आषाढ़ का, नियराया 

बिन देखे! बरसने को आतुर जैसे।


लगता है, उतर आया है, 

नीचे..... जमीं पर, वह.... 

नीला, गाढ़ा... आकाश!  

ही मानो! 

धरा... पर, कुछ ऐसे! 

गहरे धानी... कपड़ों को पहन 

लेटा.. हो, अलमस्त... 

छुट्टियों... में, घर आया, 

मिलिट्री... जवान 

मेरे मन आंगन, ऐसे। 


खिली है, सरसों, फूली... 

पीली पीली, 

कुछ ऐसे

ओढ़ ली हो, पहली बार 

आबदार! पीली-ओढ़नी 

नवधा, वय-पाई,  किशोरी जैसे।


झूमते हैं,  सिवानों.. में 

फसलों... के सिर, एक-साथ,

देख! सिहर... उठता है मन! 

ऐसा लगता है..

गा रहा हो कोई, राग उड़ता, उड़ता

हवाओं में बिखराता.. मदहोश! 

सुनता है ये खेत

भूल जाता है बल्दियत..., हैसियत

पहचान ... अपनी ... 

झूमता है बस, पल-प्रतिपल 

खड़ी फसलों को, अंक भर भर 

मतवाला हैं ये, आज, बेखबर

ग्रीष्म से, गर्मी की तपन से, 

एकाकीपन के सूनापन से

सूखती हवाओं के कहर से  


मचल उठते है, एक साथ 

सीवान पा फसलों का साथ

आकाश में उड़ रहे पक्षी हों जैसे

पर झपकाते, मुड़ते नीचे 

जहां, जहां.. तक नजर जाती है।

नज़ारा फैला है यहां..

मौज देखनी है 

तो एक बार जरूर आओ यहां! 

गडेला... क्या होता है!  

देख कर तुम ही बताओ

क्या है ये... ?  

मुझको..।

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: 

भाव: किसी की फोटो खींचना आसान काम है जो आंखों से दिल में उतर आता है। लेकिन वहीं काम अक्षरों से भी किया जा सकता है और रूप या सौंदर्य को कानों के द्वारा भी अनुभूत किया जा सकता है। इसी पर कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

आसान था 

क्लिक दबाना और 

उतार लेना तस्वीर उसकी.. ।

पर सोचता हूँ! 

क्यों उतार लूं!  वह तस्वीर! 

जो मैने बनाई ही नहीं..

चोरी... होगी, 

सीना-जोरी भी कहीं

इसी से सोचता हूं बार बार! 

चलो... उसे, दो-रंगे, अक्षरों..में  

श्याम श्वेत सांचे में ढालता हूं! 

उकेर देता हूं! सुंदर उससे...

मानसिक अदाकारी से 

पिरो देता हूँ,  

वाक्यों में अंदर।

ये रूप!  आंखों का विषय 

बनाया होगा..उसने! 

उसी रूप को... 

अक्षरों में रच रच

कान के पर्दे पर!  

बरसा लेता हूँ अपने! 

जय प्रकाश मिश्र




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