एक शर्म थी, जो कह नहीं पाया किसी से

भावभूमि: कुछ ऐसी सच्चाईया होती हैं जो सीधे मनुष्यता से जुड़ी होती हैं और उन्हें हम अपने प्रभुत्व के समय में भूल जाते हैं जिसके कारण हम अपने कार्यक्षेत्र में आने वाले मानव कार्मिकों या निम्नस्थ श्रमिको या कैजुअल कामवाले पर नियम कानून, काम के घंटों, समय की पाबंदी तो बहुत देखते हैं अपना दायित्व और एक शहरी की जिम्मेदारी भूल जाते हैं। लेकिन जब अपने ऊपर पड़ती है तब याद आता है कि आज अपना बेटा थोड़ा पहले आ जाता तो मैं बाहर घूम आता। या सुबह धूप में घुमा देता आज, लेट ऑफिस जाए।जबकि जब अधीनस्थ लेट हुए तो सारी नियम लेकर उस पर चढ़ गए। इसी पर कुछ पंक्तियां पढ़े और मेरी ही नहीं हर प्राधिकारी की शर्म को सुनें।

एक शर्म… थी, जो भीतरी थी.. 

कह.. नहीं पाया किसी से

आज.. तक! 

पैंतिस.. बरस की, नौकरी.. तक।


अब कह.. रहा हूं, 

पर,

सत्य है सब..! 

बेकार.. है अब हर तरह.. 

यह जानता हूँ! 

क्या लाभ होगा, इस कथन का 

सोचता हूं।

क्या किसी को लाभ होगा?  

मेरे,  व्यथन का! 

इस शर्म के, व्यक्तीकरण का, सोचता हूं! 


मैं… मुखौटा बाहरी था, 

पर! अंग था 

उस व्यवस्था का…

जो समस्या.. हल करेगी 

काम था… उस व्यवस्था का

लोक.. की, यह मान्यता थी।

भाव: काम करने वाली अलग विंग होती है और  उन्हें देखने और नियंत्रक वालों में मैं था। पर सबकुछ का उद्देश्य लोक हित ही था।

तो लें सुने!  

एक बात गहरी कह रहा हूँ

सामान्यतः बे-अर्थ होगी 

आप को…

यह जानता हूँ! फिर भी सुने..

बेशर्म.. होकर कह रहा हूं! 

पापी थे हम! 

दायित्व अपना, जानते ही थे नहीं

जो काम करते साथ हैं, 

कद्र उनकी…

कैसे करें… ये जानते तक थे नहीं।

वो “आदमी”… थे

सबसे पहले, “लेबर” जो थे 

कर रहे थे काम, अपनी साइटों पर..

रात दिन, छोड़ अपने बंधुओं को

जिम्मेदारी थे मेरी, 

छुट्टियां दूं, पर्याप्त उनको, 

समस्या उनकी सुनूं, खयाल रखूं 

उन सभी का पुत्रवत! 


लेकिन हुआ 

कुछ इस तरह

अधिकार मैने आजमाए, 

दायित्व छोड़ा, हर तरह

कुछ गलतफहमी, 

पाल बैठा उस समय.. मैं

सच, कह रहा हूँ ।


आठ… घंटों, की थी, ड्यूटी.. 

हर.. किसी की, 

सब जानते.. थे, मानते.. थे। 

पर, देर.. जब, 

कोई, 

किसी को हो गई 

जिन कारणों से, 

तो... 

पूछता, कारण कोई, 

था ही.. नहीं

बस डांटना.., फटकारना…, 

देना… उचित प्रताड़ना..  

ही धर्म.. था, 

दुखते हुए को और 

दुख से लादना, कर्तव्य था।


अपराध… है उसने किया.. 

समय… पर आया.. नहीं 

मानसिक और आर्थिक दंड देना 

यथोचित ही नियम.. था।


सारे नियम कानून 

बस 

साइट के भीतर चल रहे थे,

समय से हर एक आए, 

काम पर वह पहुंच जाए

सजगता पूरी निभाए, 

एक क्षण, वो.. न, बैठ पाए ।


सोचे नहीं विश्राम.. का 

यह समय, है, काम.. का।

वह देर तक बेशक… रुके 

पर, समय से पहले… न जाए,

जो चेन… चालू हो गई है

काम की… 

पूर्ण.. उसको कर के जाए।


सामान जो जो ले गया था 

साफ… कर के 

वापसी… कर 

इंट्री कराए..

तब वो अपने हाथ धोए.. 

पांव धोए…, घर को जाए।


बाहर है कितनी ठंड, 

गर्मी किस तरह है, 

बरसता बादल है या 

दंगा हुआ है

कोई नहीं मतलब किसी से… 

वह ठिठुर.. जाए, 

जल ही जाए, भीग जाए, 

लाठियों से पिट वो जाए।

कोई नहीं कानून लागू है 

वहां पर…

वो खाना खाए, भूखा रहे, अज़लस्त हो

बस दूसरे दिन 

समय पर वह लौट आए।

बस यहीं तक सोच थी, 

उस समय

इससे न आगे…।


आज बैठा सोचता हूँ 

कोई तो होगा, मेरे जैसा, 

बाप उसका! और बूढ़ा!

उस समय, इंतजार करता

मेरी तरह ही..

आज जल्दी घर वो आए

ले उसे “बाहर “ कराए, 

पास बैठे

दिन में घुमाए.., मंदिर किसी 

संग ले के जाए।

वक़्त है, सब वक्त है, आईन का

यह आईना है।


जय प्रकाश मिश्र

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