आ बनाएं, मिल सभी, हम..!
भावभूमि: आज मनुष्य से बड़ा और प्रभावी कोई अन्य जीव ब्रह्मांड में नहीं है। हम मानवो का कोई प्रतिद्वंदी भी नहीं है जो हम सा बुद्धिमान हो। विश्व की सारी संपदा और क्षेत्र पर हमारा एकाधिकार है। फिर भी सबसे दुखी और परेशान हम मनुष्य ही हैं। कारण एक है, हम सत्य से दूर होते जा रहे हैं जीवन के हर क्षेत्र में एक दूसरे को नीचा, मूर्ख, नासमझ और विवश बनाकर अपने हित साधते हैं। हम आदमी है पर आदमी के गुण और दायित्व से दूर.. झूठे.. और मतलबी। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद ले।
आ बनाएं, हम सभी,
मिल..
एक सांचा सत्य का...
माधुर्य जिसमें
लाइनिंग बन, हो लगा,
हर,
किनारों... पर,
पृष्ठ.. पर, आधार.. पर,
थोड़ा मुलायम बन सके यह!
सत्य को अपना सकें सब,
हर हाल में... मुस्कुराकर!
आ बनाएं एक सांचा सत्य का.. ।
करुणा लगी हो
स्नेह सी,
आधार में, बस, जरा ऊपर,
ग्रीस..सी,
सरका.. सकें, हम..
इसे.. बस
समतल.. बराबर..
सर्फ़ेसो पर, आदमी.. के कार्य में
ईजली..
कटुता.. के क्षण पर।
आ बनाएं एक सांचा सत्य का.. ।
प्रेम के मैटेरियल में ढाल कर...
आ बनाएं, मिल सभी, हम..
एक सांचा सत्य का।
ढाल लें जीवन सभी, मिल,
संग संग.. साथ इसके,
मुस्कुराएं,
प्यार से, और अब,
आगे बढ़ें इस जिंदगी में, सत्य में ढल,
असत्य आगे छोडे आज से,
यह त्याज्य है,
हम सभी, मानव सरल मन
बन बहें,
इक्कीसवीं इस सदी में।
आ बनाएं, मिल सभी, हम..
एक सांचा सत्य का...।
जय प्रकाश मिश्र
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