आदमी को, आदमी हो, मत सताओ।

पृष्ठभूमि: यह संसार ईश्वर की अद्वितीय कृति है। एक बार जरूर सोचें इसे आपके लिए ऐसा बनाए रखने में आपके नियंता को दिन-रात कितनी ऊर्जा और मेहनत करनी पड़ती होगी। आप एक परिवार की व्यवस्था में दुखी हो हार जाते हैं। इसलिए इस सृष्टि की कीमत समझें। सारे मानव एक ही ईश्वर की इच्छा से इस  पृथ्वीग्रह पर हैं। उन्हें मनुष्यों द्वारा अनेक वर्ग, जाति , धर्म में बांटने वाली चीजों पर विश्वास और व्यवहार वहीं तक करना चाहिए जहां तक मनुष्यता का मूल मर्म धूमिल न हो। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें मनन करे अच्छी लगें तो व्यवहार में लाएं।

मेरी... ये दुनियां… 

सच! हंसी… की पात्र है,

हूं कहाँ… 

इसमें.... खडा मैं !  

बात…

बस..., यह खास है।


कुछ नही.. 

कर्तव्य, या परिणाम है,

हूं घिरा किनसे, कहां मैं 

यह.... सोचने की बात है।


है वही.... व्यवहार सुंदर!  

छोर इक…,

जो घिनौना… 

नदी के… उस पार.. है।


क्या यही… हैं ?

“आज हम ग्लोबल* हुए हैं”

देखता हूं, मैं खड़ा, बालक सदृश! 

कौन… है ? जो बांटता… है!  

इस धरा… को,

क्या.. मनुष्यों?  

इसमें… भी, अपवाद… है।


हो.. जहां पर 

सत्य.. की, तुम राह.. लो

भूल.. जाओ, तुम अफ़ीमे.. भूल जाओ

पास आओ… एक दूसरे के..

गले, मिल कर

आपसी.. शिकवे... मिटाओ।


है तुम्हारे बीच ही, 

परमात्मा.., अल्ला.., खुदा.., ईश्वर तेरा

क्या नहीं है? 

दिल पे रखो हाथ, सच! 

तुम ही बताओ! 


छोड़… दो, सारी वो बातें..

थीं पुरानी…

यार! अब तो

ज्ञान के विज्ञान के प्रतिनिधि हो तुम, 

आदमी को, 

आदमी हो...., मत सताओ...।


बाज आओ, 

लोग सारे बाज आओ...

एक होकर, प्यार से भर, 

सृष्टि को इस.. 

एक बार तो, कसम तुमको! 

यारों मेरी..  "सुंदर बनाओ"।


कैसे कहूं अब! ...... सबसे! 

माफ... कर दो, पाप... उनके.... 

माफ.. कर दो पाप इनके...! 

इसके लिए, मिल सभी

कसम खाओ, 

आदमी हो...

आदमी... के, काम... आओ। 

जय प्रकाश मिश्र

भाव: अपना संसार आज दुखी है। इसके वाशिंदे मानव ही नहीं पशु पक्षी नदी, पर्वत सब दुखी हैं। आदमी को ईश्वर ने बुद्धि दी है और इसलिए जिम्मेदारी भी वह इसे हर तरह स्वस्थ बनाए। आपसी विद्वेष के रहते यह संभव नहीं होगा। इसलिए लोग अब वक़्त आ गया है साथ आगे आएं।


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