इंदीवर! कैसे पहचाने प्रभा सूर्य को।
भावभूमि: यह जीवन और विश्व एक रहस्य हमेश से रहे हैं जब की इतने दिनों से मनुष्य यहां का अधिपति अपने को ही मानता है। कुछ भी हो यह झीना परदा रहस्य का कोई हटा नहीं पाया और वह छुपा सर्वशक्तिमान आज भी वैसे ही रहस्य बना हुआ है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
कौन है
जो झिलमिलाते
व्योम से है देखता..
नीचे धरा को.. शांत मुख हो,
हर हृदय में झांकता!
इन बह रही चंचल
हवाओ का
नियंता
कौन
है।
जो
बादलों की
सेज पर, दिन रात फिरता घूमता।
देखकर
जिसको?
घटा श्रृंगार करती,
गहन बन में.., कौन है?
जो डोर मन.... की बांधता!
किसके कहे पर
मोरनी...
खुश नाचती है, विकट बन में..,
कौन है जिसको पपीहा
प्राण भर के पुकारता।
किसके लिए
हर एक सरिता..
पार कर.. इस विजन बन को..
दौड़ती है.., रातदिन,
काटती है.. पत्थरों को..।
किसके लिए
रसधार अपने कंठ में
भर भर सदा
कोयलें हैं पुकारती...
अमराइयों की छांह में..।
नील इंदीवर
प्रभा कैसे समझता
अरुण की है...,
चांदनी में मुस्कुराती
कुमुदिनी क्यों रात ही.. में।
कौन है रस घोलता
मीठा मधुर रस मंजरी में
किसके लिए ?
यह धरा नच नच
रात दिन को धारती है।
क्या मनुज है
मात्र ही! अधिपति.. जगत का
या अन्य कोई और है
जो कर रहा सब इस तरह ।
जय प्रकाश मिश्र
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