तहजीब-ए-गंगा-यमुनी,
पृष्ठभूमि: आज समाज की समरसता अनेक बिंदुओं पर कमजोर हो रही है, लोगों में आपसी दुर्भाव बढ़ रहा है। लोग व्यापक समाज और देश की नहीं अपने धर्म, जाति, वर्ग, मजहब में दफन हुए जा रहे हैं। और कुछ लोग अपनी दुकान इन्हीं अफीम के सहारे चलाते आ रहे थे और आज बंद होती देख ज्यादा मुखर हैं। इनसे सावधान रहने की जरूरत है और अपने परिवार, अपनी उन्नति, और समाज की समरसता के लिए काम करना है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें, आनंद लें।
घूमते हैं लोग,
कैसे.. सड़क पर,
झंडे.. लिए निज हाथ में,
रंगीन,
कितने.. रंग के
धर्म, मजहब, और संप्रदाय के।
नारा... लगाओ!
बोलते.. हैं, आपसे..।
आग... बोते चल रहे हैं!
धरा पर.., ये
सामने! ही.. हम सभी के..
चुप खड़े हैं आप..,
हम..
सब देख कर.., पर! जल रहा है
घर... जो अपने सामने...
अपना.. ही तो है,
याद.. रख! उनका... नहीं है!
देख तो...
जो.. रो रहा है... सामने,
बिलखता, डर कर खड़ा है!
कल तक तेरा था पड़ोसी,
संबल तेरा था
ले भागता... है आज, कैसे पिता... को
कंधे.. बिठाए, बूढ़ी.. मां को...
छोड़ कर!
बच्चों... को अपने,
बाकी बचे परिवार को
इस स्थिति में.. देख तो..
वो!
तूं.... ही, तो है, पहचान फिर से
वो तूं... ही, तो.. है
आज का, इस बार का
बिल्कुल नहीं..., कल.. का मगर।
इसलिए तूं छोड़ यह.. नारा लगाना,
रास्ते पर अपने चल.
और जिंदगी में आगे बढ़..
चल.. जिंदगी में आगे बढ़..।
जय प्रकाश मिश्र
पृष्ठभूमि: आज समाज के बीच, बाहर से आकर कुछ लोग अपनी बाते कह कर छुपकर चुपके चुपके अनेकों जहर.. विचार का, भावना का घोल जाते हैं। इन लोगों से सावधान रहें। अपने आस पास के ही लोग सदा काम आते हैं। उनपर भरोसा रखें। और पुरानी तहजीब को तरजीह दें।ये आग लगाने वाले आग लगाकर खुद भाग जाएंगे आप को जलता हुआ छोड़कर। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।
ये... पर्दे!
रंग.. बिरंगे, ऐसे
लुभाते.. कैसे.. लगते हैं बिल्कुल
"अपने से.."
कट..समेटे कितने पैने,
वजनदार, अंदर से
देखने.. में,
लगते हैं, कितने.. हल्के..!
भाव: समाज में कुछ लोग एक पर्दा सा लिए, विभिन्न रंगों का, अन्यान्य पृष्ठभूमि की भ्रामकता के साथ, आमजन को बरगलाने के लिए प्रयोग करते हैं। जो देखने में तो सामान्य होता है पर उनके दिमाग को भीतर से विकृत कर देता है। उन्हें कट्टर और हिंसक बना देता है।
किसने..?
लगाए हैं यहां...
इतने... भीतर! घुस इनको
इतने.. गहरे! पूछूं किससे.. ?
मैं..आम.. आदमी हूँ!
जनाब!
यहां तो ऐसा..,
कोई... भी, नहीं, दिखता है... मुझे!
कब आता है,
लगा जाता है, चुपके..से
कैसे चिपका. जाता है..छुप.. के!
ये... पर्दे! दिमागों इनके
कि....सारे, खेलने.. लगते हैं,
आगे इसके..
बढ़-बढ़ के, कैसे-कैसे खेल,
विध्वंश के!
इन्हीं रंगी-रंगों के पर्दे...के चलते
छोड़... सारी, आपस-दारी..
अरसों... की मुहब्बत,
तहजीब-ए-गंगा-यमुनी,
पुरानी भारी ।
माहौल.. बिगड़ जाता है,
इन पर्दों के रंग..से..ऐसे
खेल... हो गई हो, जिंदगी सबकी...
पर्दे के आगे.., कमतर.. बौनी..
बिछ जाती हैं
सारी... आशाएं, उम्मीदें
लड़ लड़ के, मर..मर के,
कट कट.. के, जमीं पर नीचे।
रोती, बिलखती, दम तोड़ती
आपसदारी की रस्सियां
सारी छोड़ती।
और वो जिसने लगाए थे
ये कुत्सित पर्दे, छुप जाता है,
देखते ही देखते, पीछे
इन्हीं पर्दों के पीछे।
सोचता हूँ!
वो मात्र अपने लिए,
अपने ही जैसे
कुछ और लोगों के लिए
कैसे बदल देता है,
माहौल..
जहर घोल देता है, इनमें
इन सुंदर बहती, आपस में घुलती,
मासूम हवाओं के बीच
रुख! इनका बदल देता है,
इतने हल्के।
कैसे बहका लेता है
भीतर से भूखे, परेशान पब्लिक को,
जेहन से इनको!
कौन! बैठ जाता है जेहन में
उनके.. ऐसे...
मुंह बांध..., छिप! इन्हीं पर्दों के पीछे...
इनके बर्बादी की कहानी
वो लिख जाता है... कैसे!
सब कुछ तो मेरे सामने ही है,
घटता..है, देखता हूं, भुगतता भी हूं,
बच्चों को ले के अपने,
दर दर.. भटकता... मैं भी हूँ
जी हां, वो मैं... ही हूँ,
जो.. घर, छोड़ के..,
जलता घर.. अपना
देखता हूं.. भागते, भागते..
छुपते, छुपते..
पीछे मुड़..., मुड़... के,
छिन जाता है, जिसका टूटा ही सही
आशियां सबसे पहले।
कौन है जो इन घटनाओं की धुंध में
खो जाता है,हर बार पहचान से पहले।
जय प्रकाश मिश्र
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