फिर नहीं, वापस वो लौटी, आज तक!

पृष्ठभूमि : परीक्षा एक अंत भी है और नई शुरुआत भी यह आपकी जीत और हार से निर्धारित होता है। पर कोई-कोई परीक्षा की घड़ी जीवन और मौत को ही साथ में तौलने लगती है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें। जीवन का हर पल एक परीक्षा होता है उसमें पास होने की सदा कोशिश करते रहें। भय कल्पना में होता है उसे पास न आने दे। मार्ग और हल ईश्वर जरूर देगा विश्वास रखें।

"परीक्षा" आसान है, 

कहना.. हो 

मुंह से..,

गुजरना…पर! कठिन... है! 

साथ.. इसके।

देखिएगा, सोचिएगा, 

बात मेरी, आप फिर से..। 

याद करिए, 

पुनः वो क्षण, जिंदगी के,

तुल रही थी जिंदगी जब 

हिल रहे, पलड़ों पे, रख के।


कभी..गुजरना.. 

उस.... गली.. से

साल.. पहले, बैठ कर.. 

एकांत.. में, कमरे.. में जिस, 

बस तीन घंटे बिताना.. था, परीक्षा का

कितना अहम.. था,

एक भी, 

जब प्रश्न, हल से छूटता.. था 

कैसा!  पसीना.. सीजता था! 

पर पता.. था, सब मोटा मोटा…

ठीक है, सब ठीक है..

इसलिए डरना मना था।


पर… परीक्षा, एक देखी, 

आज.. मैने! 

एक चिड़िया, घोंसले में...

पैदा हुई.. मेरे सामने, 

कुछ दिन... हि, पहले..। 

चार दिन में, चीं ची करती..

प्यास से वह.. 

तड़पती...चिल्ला रही थी!  

दूध, चिड़ियों को कहां 

होता ही होगा..

मैं, सोचकर! हैरान था,

कैसे बचेगी.. !

नन्ही… चिड़िया! 

इतनी… ऊपर डालियों पर! 

धूप में, सूखी हवा में..! 

और आगे..।

मैं, डर गया था, "भय" से डर के।


पर.. क्या हुआ..? 

जो.. चली... ना,   एक पग.. भी

भूमि.. पर! सपनो में मेरे...

अरे...! वह तो,  उड़.. चली...! 

पांचवे.. दिन घोंसले... से

देखते...! मेरे… देखते..! 

देखते मेरे… देखते! 


पास कर ली थी, परीक्षा..., 

उस.. बालिका ने,

फाख्ता... ने 

नन्ही सी  "जां"... ने..

उड़.. दिखाया, 

और फिर वापस.. न लौटी

आज तक, उस घोंसले... में।

भाव: कठिनाइयों से कभी भी कल्पना-भय न पालें। मार्ग और हल हमेशा प्रकृति देती ही है। आप हिम्मत और उम्मीद बनाए रखें। परीक्षा आप जैसे ही लोग पास करते हैं। साहस से जीत मिलती है। 

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: चांदनी का साथ कैसा

भाव: आज का लेखक अब वास्तविकता और यथार्थ कैसे लिखेगा उसे इस व्यवसाय पर अपना परिवार भी पालना होता है। इस लिए शब्द की ताकत कम होती जा रही है।

शब्द... मैले, हो गए... हैं, 

अर्थ… के, अभिमान.. में

वह, कहां बच पाएगा अब,

पेट.. की, निज.. आग से।

भाव: जो लेखन पहले निर्भीक और निष्पक्ष होकर लेखक करते थे अब उसमें अनेकों वाद, और स्वार्थ आ गया है। अतः गीत धुंधले हो गए हैं स्पष्ट आलोचना नहीं मिलती। यद्यपि सब हरि इच्छा से ही होता है।

कैसा धुंआँ सा छा रहा है 

मेरे गीतों में अरे..!  अब

ये क्या रचा है रचयिता ने 

स्वयं... के उद्यान.... में।

भाव: दिव्य और स्पष्ट लेखन की परम्परा शनैह शनैह समाप्ति पर है। आज हर कोई आका को खुश करने के लिए और पैसों के लिए लिखता है। फिर भी लोग हैं जो दीप टिमटिमाता हो क्यों न हो, कोशिश कर तो रहे ही हैं।

दिव्यता का जल कहां 

अब इस कमंडल में बचा है

तज आप की परिशुद्धता 

इसमें नहीं मुझे दीखती है।

जाऊं कहां मैं खोजने 

खुद को धरा पर अब यहां

मेरी पहुंच बस मुझ्तलक है 

मुझतलक है, मुझ तलक हैं।

जय प्रकाश मिश्र




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