जिसे मैं समझता रहा दुनियां अपनी...
पृष्ठभूमि: जीवन में कभी कभी, कोई कोई, लोग इतने तरल, सरल, निर्मल मिल जाते हैं कि एक प्रेरण हमारे लिए अनुस्यात ही हो जाते हैं, जीवन भर कभी भी भुलाए नहीं जाते। वे दरिद्रनारायण स्वरूप बेशक हों पर आचरण और लोक व्यवहार में शीतलतम होते हैं, मधुर मर्म लिए उनका साख्य जीवन की संजीवनी बन जाता हैं। उन्हीं लोगों पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। अपने जीवन में इसे तौलें भी, प्रसन्न रहें।
उसपर कुछ नहीं था,
क्या धरा था?
देखकर !
लगता
नहीं
था।
पर
जो
कुछ
भी था,
वह साथ था।
अपनेपने में आप था।!
साबूदाने के कच्चे, दाने हों
ऐसे... छटकते, खनकते,
ठोस, धवल, चमकते..
उसके शब्द निःसंग हो निकलते।
छोटे बच्चों सी, उसकी
निर्मल.. हंसी.. .
बांध.. लेती थी, मन! मेरा
ही नहीं, सबका।
बिखरती हो! अनार-दाने सा
मीठा स्वाद, रंग.. गुलाबी रंग..,
संग.. अपनापन लिए
कुछ ऐसी...
किनकती! करकती, महीन दर्द भरी
वो आवाज!
सच! छू लेती थी!
हर किसी के अन्तस...का.. मर्म।
बिल्कुल
किसी, मकड़ी के
जाले से हो लटकती...
पतली.., बहुत पतली.., डोर.. सी;
हिलती..
सांसों की हर लर.. में लटकती,
कम्पन करती, ऐसे कांपती,
हिल उठता हो!
हो तार! तार!
पंखुरी सा कोमल, हृदय निलय..
का द्वार..।
अंदर से कहीं, अनकहे
अनचाहे
चुप, छुपके,
जब जब...
देखता हूं, उसे...
बाहर से; भीतर अपने...,
सदा.. अपने भीतर ही पाता हूं।
फिर भी वह, वाह..! कितनी!
प्रेजेंट!
सच! उसे देख...
दिल...कैसा फूल... सा
हल्का, हुआ.. जाता है।
क्या?
है कहीं कुछ... ऐसा?
जो हर ओर
चिटक कर ऐसे.. छिटक.. जाता हो!
सफेद... संगमरमरी... फर्श पर..
ऐसा! निश्छल.. बिखर कर!
खिलता हुआ।
नहीं! नहीं।
पर वो.. तो कुछ ऐसे ही...
मुस्कुरा रही थी
दाने हो चिटक कर, छटकते,
ऐसी दबी... हंसी!
होठ.. के कोनों... से
छटका... रही थी।
मुझसे क्या कहती !
मैं तो, बहुत दूर था, उससे !
पके बाल, सामान्य धोती
मोटी नाक, चौड़ी गर्दन
कुछ स्थिर सी चाल
निगाहों में रौनक!
अजीब सी
फैलती,
पर
कुछ था,
क्योंकि “और
ज्यादा की उम्मीद..
और तमन्ना...” दोनो वहां नहीं.. थी।
जो भ्रम.. के आवरण.. में
डूबा.. लेते हैं सबको।
वहां था तो केवल
अपना संबल..
निष्कम्प..
दीप
शिखा सा
मजबूत.., दीपित।
अपने बलबूते.. की धमक..
ओढ़े मोटी खाल.. और मोटे वसन..।
पर
उस पर
क्या नहीं था
सोचता हूँ आज बैठकर!
जिसे कोई सोचे, आज!
बैठ! किसी भी ऊंची जगह पर!
लिए, मन में भूचाल!
मायूस, अनमनी
जीवन की हरितिमा से दूर
लिए अकेलापन..
शांत..
गुनती... बुनती... मैं संबंधों
की डोर,
खोजती कभी.. ओर.. कभी छोर..
संबंधों की दरारों को चौड़ा होते
और चौड़ा.. होते देखती...।
एक सूखी.. हंसी...
नहीं... खांसी आई, मुझे
ठक से आवाज लिए, गले से
नहीं सीने.. से।
आंखे.."बुझे दीप" सी
लालिमा और कालिमा लिए
मुरझाए फूल सी
चेहरा "हारे हुए
जुआरी" सा लिए
सोच में ग्रस्त
अपने मे
संत्रस्त!
जिसे मैं दुनियां समझता रहा
वो मैं ही था,
ये पता तो मुझे आज लगा
दुनियां तो सारी
लोगों की खुद की ही थी
मेरी तो.. बस कहने भर की ही थी।
जय प्रकाश मिश्र
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