जीवन के रंग हजार!
पृष्ठभूमि: जीवन के रंग हजार! कभी अच्छे-दिन कभी हल्के -दिन! जीवन में "शीर्ष और तल" से मुलाकात होती ही है, एक चक्र की तरह घटना क्रम और उसी में जीवन चलता है। थोड़ा धैर्य धारण करना चाहिए और शांति से उद्यम करते रहना चाहिए। लेकिन याद रखें यदि आपका उद्देश्य अच्छा है, और स्वार्थ से ऊपर है तो यह नियति भी, आप के साथ, एक एक ग्यारह बन जाती है। इसलिए जीवन का लक्ष्य मानवता की दृष्टि से अच्छा होना चाहिए न कि जाति, धर्म और मजहबी अथवा क्लासीफाइड उद्देश्य को लेकर। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
यह जिंदगी.. है, मेरे भाई!
रंग… हजार! हैं, इसके,
परेशान.. न हो।
जब
मिले थे
उस बार, तुम मुझसे,
वे.. दिन.. गुलाबी… थे.. ।
बदन पर..
फूल.. उग आए थे मेरे..
सच!
कैसे...! वे महकते थे।
एक तूं ही… तो नहीं..
लोग.. थे, आते थे, देखने मुझको!
वो भी क्या.. दिन थे, इसी जिंदगी के।
कैसे कैसे घोंसले..
चिड़ियों.. ने
बना.. रखे थे, मेरे ऊपर..
बच्चे.. उनके! अपने हों जैसे..
शामोसुबह!
चहकते.. थे, मेरे.. ऊपर,
मानता... हूं, वे दिन.. अच्छे थे।
अबकी.. आए हो तुम..!
इतने... दिनों.. बाद..
मिलने.. मुझसे..
पर, ये…
पतझड़… है, मेरे भाइ !
आती ही.. है, सभी के ऊपर..!
देख न!
झर.. रहे हैं,
कैसे! धीमे.. धीमे..,
एक एक कर, अब.. मेरे,
वे ही पत्ते..
पता है मुझे, उड़ गए होंगे
वे सारे.. नन्हे नन्हे बच्चे!
छोड़ मुझे, देख!
मेरी... हालत को!
चल छोड़! झर.. जाने दे,
बचे.. खुचे,
ये भी,
सारे, के सारे.. पत्ते..।
निखालिस, नंगे! हो जाने दे, आज मुझे।
हैरान न हो!
साख.. ऐसे ही होते हैं,
मजबूत.. इरादे वाले, सदा.. से,
याद.. रख!
अच्छे से इस गर्मी में! तपने.. दे मुझे।
मेरी एक बात सुन गहरे..! और गहरे..!
मुझपे नन्हें.. मुलायम कोपल
भुनगों.. जैसे
निकलने तो..., दे..
चिंता ”उनकी” मुझको नहीं
”उसको” होगी, सच.. मान मेरी!
पानी… नमी, ठंडी.. हवाएं
सात समंदर पार से
भर भर, अंजुरी में लेकर वो आएगा
भेजेगा, वो खुद ही
देखना यहीं पर!
तूं परेशान न हो,
बस इरादा तेरा मेरे जैसा सच्चा हो!
जीना दुनियां के लिए।
मरना दुनियां के लिए!
बस यही काफी है,
तेरी जिंदगी के लिए।
वे दिन फिर से लौट आएंगे
कलियां लगेंगीं, फिर से फूल मुस्कुराएंगे।
जय प्रकाश मिश्र
छंदिका सूक्ष्म
तूं इतना
सूखा नहीं है अभी।
तेरे आंखों में एक चमक थी रे!
पुरा...नी.. बड़ी,
वो गायब है अभी..।
देख तो.. क्या वो इधर ही है,
कही, क्या.. पड़ी!
सूना लगता है तेरा.. चेहरा,
ख्वाइश.. में जब तूं डूबता है किसी
खिल जाता है, कदम के फूलों सा,
मान मेरी..
जब जब, कदम, प्यार में
तूं बढ़ाता है, किसी की तरफ।
जय प्रकाश मिश्र
हनुमान जयंती की आप सब को बधाई ।
लक्ष्य.. था इस विश्व को!
राक्षसों.. से मुक्त.. करना!
राम राजा.. आ गए
पास... उनके,
पांव.. चलके..
जंगलों में भटकते..
मिल गए,
दिल खिल गए
दोनों के एक से..
और फिर.. आरंभ कुछ ऐसा हुआ
प्रभु राम के, ही हृदय में
हनुमान ही, वत्स बन कर बस गए।
कारण बने हर कार्य का
हर सिद्धि का
हर, ही थे वे, अंजना के पुत्र
बन कर आ गए।
प्रभु हर हर, महादेव के साक्षात स्वरूप
श्री भक्त शिरोमणि हनुमान जी को
जन्म दिन की कोटि कोटि बधाई।
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