आ मना लूं प्रभु को अपने,

पृष्ठभूमि: हम सभी देवस्थान पर जाते हैं और अपने इष्ट से अधिकाधिक सानिध्य की कांक्षा भी होती है पर आम लोगों के लिए बाहर से ही उन्हें दूर हटा दिया जाता है पर कुछ धनकुबेर या प्रभाव संपन्न लोग घंटों भीतर जहां आप झांक नहीं सकते बैठ कर अपने परिवार जन सहित सारे कर्मकाण्ड सम्पन्न करते हैं। इससे लोगों में एक टीस उपजती है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

चाहत बहुत थी, सच कह रहा हूं! 

बैठकर, कभी गर्भ गृह में! 

ध्यान से पूजा करूं! 

मना लूं प्रभु को

मैं, अपने, 

ओंकार! का दर्शन! करूं।


एक बार, 

अपने देव से 

साक्षात, मैं भी मिल सकूं

बातें करूं मैं बैठ कर, 

सम्मुख तो उनके हो सकूं,

आनंद में मैं डूबकर, रंग उनके, रंग सकूं।


पर, यह कठिन था,

संभव नहीं था! 

आम तो, बिल्कुल नहीं था,

कोई बैठ, पाए 

देवता के, गर्भगृह में! 

वह भी अकेले!  

शांति से, पूजा करे..!  

इच्छित समय तक! 

वह आदि शिव की अर्चना 

शांति से, विधिवत करे! 

मन-कांक्षना तक, वांछना तक।

 

भीड़ थी, 

चौबीस घंटे, रातदिन! 

मैं देखता था, जानता था, 

समय कम था, 

कोई रुक सके, उस जगह पर 

और बात अपनी रख सके।

संभव नहीं था, गर्भ गृह में।


इसलिए … मैने चुना है

मार्ग अब, 

मैं, खुद, बनाऊं… 

एक विग्रह..,  इन देवता का

अपने.. भीतर।


बहुत सुंदर! अपना अलग,

अपना अलग! 

सजा दूं! मैं, 

इस, देवता की मूर्ति को 

स्वप्न सा, अदभुत मनोहर! 

उन, भूतियों से, प्रभूतियों से

स्वर्ण में, आह्लाद भर!  भर! 

आभामयी.. उन रश्मियों से

जो, विकेरती हों, 

परावर्तन... 

सुनहला..., गाढ़ा-विरल..., 

काल.. के पंखों पे.. चढ़ कर! 

मूर्ति पर आपाद-मस्तक..! 


सोचता हूं सजा दूं 

कुछ पुष्प.., इंदीवर के सुंदर...

गले में.., इस मूर्ति के..

मेल दूं… चंदन की माला.. 

कंठ में, इस देवता के, 

पांव में, लाली लगा दूं 

आलक्त सुंदर! 

दीप का जोड़ा जला दूं 

शुद्ध घृत का सामने! 

अर्घ्य का एक पात्र रख दूं! 

जल भरा..।

सुगंधित अंगार पर 

कर्पूर का दीपक जला दूं।

फिर बैठ कर मैं शांति से

पास इनके हाथ जोडूं 

प्रार्थना में मन लगा लूं।


पर, कुछ थे, 

प्रतिष्ठित, महाजन, 

नेता बड़े, व्यवसाय-श्री, 

श्री-शीर्ष पर, 

अधिकार-सम्मत पदों पर, 

शासन समन्वित, समर्थित! 

न्याय के, बल के प्रणेता, 

याचना... को जा सकें, 

परिवार के संग.. 

देवता के  "गर्भ गृह" में 

शान से, बैठे रहें

पूजा करें,

बात अपनी प्रेम से वे देवता से कह सकें।

मुझे खेद है.. इस बात का..

मुझे.. खेद है।

मुझे आम जन की ही तरह

इस बात का... मुझे खेद... है।

जय प्रकाश मिश्र


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