मैं मुरलि बन,"सांवरे" की,

पृष्ठभूमि: अपने समाज में कृष्ण भक्ति का विशेष महत्व है यद्यपि कृष्ण महावीर थे और उन्होंने क्रूर राजाओं और नृशंस लोगों को दंड दिया फिर भी अपने जन मानस में वह माधुर्य और निश्छल प्रेम के प्रतीक भी हैं। भक्त की कामना होती है प्रभु से निकटता और मिलन इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।

मैं मुरलि बन,"सांवरे" की,

मंत्र सी विस्तार पाऊं।

पा अधर स्पर्श अमृत,

विषय सारे भूल पाऊं।

अर्थ: किसी भक्त की चाहना है कि वह श्रीकृष्ण की बांसुरी जिसके लय मंत्र से कल्याणकारी हैं वह  वही वंशी बन जाय। वह कृष्णमय हो जाय दुनियागिरी भूल जाय।

हा! अधर की यह रसिकता! 

प्राण में यह स्फुरण! 

मैं सिमट कर मिट न जाऊं,

स्वांस का बचे स्मरण।

अर्थ: कृष्ण के अधर रसाल हैं, मधुर रससिक्त हैं। भक्त की चाहना है कि वह जीवन गति भूल स्वांस में कृष्णनाम की माला जपे।

स्वांस भर सुर ताल है

अभिलषित नेत्र मराल है।

भूतिलय लय है नेह सारा

उस सांवरे का कमाल है।

अर्थ: जीवन बेकार है, अतः इच्छा कृष्णाक्ष की कोमलता देखने की है जो मराल राजहंसिनी सी आकर्षक हैं, प्रेम में स्नान कर सांवरे कृष्ण संग रमण की चाहना है।

नेह राधा की नही अब,

कृष्ण से क्या उलाहना।

रस युगल उर में बहे,

प्रेम...सी न प्रताड़ना।

अर्थ: प्रेम एकत्व है, राधाकृष्ण का एकत्व ही प्रेम है। प्रेमरस उर या हृदय का विषय है यद्यपि प्रेम में बिरह या प्रताड़ना दिखती है पर यह प्रेम का परिणाम ही है प्रेमी को यह अच्छा लगता है।

सच कहूँ तो चल चपल

चंचल चिकुर की स्वामिनी,

बांके बिहारी के विकल

प्रति प्रेम की अनुगामिनी।

रूप वह उल्लास का

प्रेम पथ मधुमास का,

नयन बांवरें देखता 

मै था कहां

मुझे ना पता, मुझे ना पता। 

अर्थ: प्रेम का अंत अंततः अनन्तता से मिलन होता है, एक भाव स्रवित होता है जो सुख आनंद और अनुभूति को उत्सर्ग की ऊंचाई निसर्ग तक को स्पर्श करता रहता है। दोनों अलग रहते हुए एक ही हो जाते हैं।

हा अधर की प्यास वह तेरी अपूर्वा

हा सुखों की आस वह तेरी अपूर्वा

हा नयन के बाण. वह तेरी अपूर्वा

बच सकेगा जो, वही..गंधर्व होगा।

अर्थ: प्रेम में एक स्टेप के बाद मिलन की प्यास मिट जाती है, देखने की लालसा नहीं आत्म में प्रिय दर्शन होने लगता है और वहीं स्थिति गंधर्व की या अंतिम परिणति होती है। प्रिय और प्रेमी एकलय हो जाते है।

देखकर तरु के तने की पत्तियां...

सोचता हूँ... ये कभी.. 

अरमान थे! 

हाय! पीले... हो गए हों 

आज जितना..

मेरे लिए बस पेड़ ही सम्मान हैं।

जब तक कली थी 

ऊर्ध्वमुख थी

संग सबके, झूमती थी 

डाली के ऊपर...शीर्ष पर! 

आज जब खिलने लगी हूँ, 

देखती हूँ... 

इस शीर्ष से...  अब! 

अंत सारा, 

हा! हुए नत माथ 

जो कल.. खिल चुके थे।

अर्थ: जीवन आशाओं और उम्मीदों की कथा है।क्रम से उम्मीदें बढ़ती हैं एक के बाद एक आतीं हैं। पूरी होती और समाप्त भी होती हैं और जीवन इसी के बीच अपनी सार्थकता पा लेता है।

पग तीन: सुबह का सौंदर्य

बस सुबह होने को थी, 

तब..! 

जिस दिन सुबह!  देखी थी मैंने।

हर तरफ.. सब्ज... बहार थी,

खुशियों.... से मालामाल.. थी


हो हवाएं नम्र!  

झुककर पास आतीं..

फूल कलियों पत्तियों को 

थीं झुलातीं

छू मुझे अपने अधर से 

चूमती... थीं

साथ चलने को विवश हो 

पूछतीं... थीं।


पूर्व के नभ में हंसी 

सकुची खड़ी थी,

मुस्कुराहट पार्श्व में खिलती 

खड़ी थी

पुष्प-कलियां साथ में 

हिलने लगी थी

किरण भर कर प्राण अविकल 

हो चलीं थीं।

जय प्रकाश मिश्र



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