परेशां हूँ बहुत! शर्मिंदा.. हूँ, खुद.. से।
पृष्ठभूमि: अनेक बार ऐसा होता है, हम अपनों से खीझ जाते हैं और अपने लोगों की गलतियों से हमारा भी सिर शर्म से झुक जाता है। इसी तरह जिस दौर-ए-वक़्त में संसार के नेता और जिम्मेदार लोग मानवता के मूल की रक्षा नहीं कर पाते, और वह रो देती है, अपनी मूर्तियों के जीवित हृदय से, तो सभी का मन तो शर्मसार होता ही है। आज भी दोषियों की सही पहचान और उन्हें सही कड़ा दंड दुनियां में अपेक्षित है। इसी से जुर्म का सिलसिला थमता नहीं है, और सामान्य लोगों के हिस्से अकारण पीड़ा आती है। और बिना पूरा सच जाने हम इन दुष्टों की हिमायत करने लगते हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आज की समाज सरिता में नहाएं।
मत.. बात कर!
मत पूछ... मुझसे,
दूर रह!
परेशां.... हूँ बहुत!
शर्मिंदा.. हूँ, खुद.. से।
दुख है मुझे! मै साथ हूँ!
यहीं.... हूँ!
इस सदी.. में साथ.. इनके!
काल... के,
इस खंड... में,
एक आदमी के रूप में।
बांटता हूं, साझा हूं करता..
समय अपना, साथ ही...
इन सभी... के
विश्व के बड़-नायकों,
महानायकों
खलनायकों के साथ, मैं.. भी!
कष्ट है! मैं आदमी हूँ!
इस समय पे..!
इस धरा... का, साथ.. सबके
कष्ट है!
क्या लिखेगा?
वक़्त! अपना... वाकिया!
उस पेज.. पर,
आज से सदियों सज़र की
गुजर.... पर!
सोचता.. हूं, बैठकर!
इक्कीसवीं इस सदी... की,
आपसी..... इन युद्ध.. की,
मर.... रही इस मनुष्यता... की,
इस लोभ.... के व्यापार की,
व्यापार की ही, धधकती, जलती हुई
आपसी: इस आग... की।
भस्म हैं, मनुष्यता,
प्रेम, करुणा, संबंध सारे
एक संग,
लोभ.. कितना!
लाभ कितना! हाय!
सबको चाहिए
आ गए, जिसके लिए,
ये बेचने...,
चने... भी अब,
उतर कर.. व्योम से, आकाश से
तारे... थे ये, चमकते,
भूमि.. पर
इस देश के सुप्रीम थे जो।
छप रहे हैं,
प्लास्टिक की पन्नियों पर रूप इनके
चेहरे... इनके,
उड़.. रहे हैं, गिर... रहे हैं,
बज़बज़ातीं.. नालियों के पृष्ठ ऊपर!
देख कैसे.., मधुर चिकने,
फेस.. लेकर,
सितारे थे ये,
खैनी की थैली छप रहे हैं,
रूपए की लाश लेकर!
सोचता हूं क्या लिखेगा?
वक़्त! अपना... वाकिया!
उस पेज.. पर,
आज से सदियों सज़र की
गुजर पर।
गिर... रही!
इस साख की, विश्वास की
सूखती सरिता सुरीली,
जा रही है, रो रही है, इस सदी की।
आंसुओं.. से बुझ... रही है,
रो रहे, बाल शिशु के
पेट.. की तो, आग... अब,
दर्द के चित्कार.. की
हृदय की,
आत्मा.. की वेदना... की,
पाशविक.. इस चेतना.. की,
क्या लिखेगा? वक़्त!
अपना... वाकिया! उस पेज.. पर,
आज से सदियों सज़र, की
गुजर पर, सोचता हूं!
जिसके लिए,
जीवन दिए, हंसते हुए,
जो लोग... अपने,
वो वीर.. थे, उम्मीद... से थे..
यह सोच.. कर,
इस भावना.. से, अभिप्रेत होकर
एक दिन. इस भूमि के
हर.... पेड़ पर
खिलेंगे.. फूल, सबमें..
सहज... सुंदर,
सब मिलजुल रहेंगे.. ।
महक का राज होगा
फिर नहीं कोई दर्द देगा,
नहीं शैतान होगा, इनमें कोई
और आगे।
माथा पकड़ कर बैठता हूं!
आज अब! जब देखता हूं!
सोचता हूं!
कर्स हैं!
हम सभी, मिल कर
धरा पर, इस समय पर।
रो रही है, मनुष्यता!
सच कह रहा हूं!
रो... रहे बच्चे हैं, बूढ़े... रो रहे...हैं
आधुनिक.. इस सभ्यता.. के
शिखर.. के, इस अभ्युदय.. पर!
क्या लिखेगा?
वक़्त! अपना... वाकिया! उस पेज.. पर,
आज से सदियों सज़र, की
गुजर पर।
डर समाया, आज ऐसा इस धरा पर
विश्वास धूमिल हो गया है आपसी
हर देश का हर देश से
हर धर्म का हर धर्म से
हर कौम का हर कौम से
हर जाति का हर जाति से
हर आदमी का आदमी से।
शंका के बादल घेर कर,
हमको खड़े हैं
चहुंओर मानस, बदलता सा जा रहा है
गरजते है फाइटर, बारूद लेकर
घूमते है...
खोजते.. हैं टारजेट,
हर किसी की सरहदों... पे ।
ये क्या हुआ है? हम सभी को
देखकर हैरान हूँ
एक रोटी के लिए
जब, दौड़ते हो अपने बच्चे
भूख ले ले.. इस धरा पर
तब, नील नभ में दीखते हों,
शत-नील के बारूद फटते।
मै फट गया हूँ! सच कह रहा हूं
भीतर कहीं से।
क्या लिखेगा?
वक़्त! अपना... वाकिया! उस पेज.. पर,
आज से सदियों सज़र, की गुजर पर
यह सोचता हूं।
करोड़ के जलते हुए, इस धुंध में
वो चला जाएगा, नाटो.. देश में
इस बात से वह डर.. गया,
और भर.. गया
आक्रोश.. में, फिर चढ़ गया,
आक्रांता वह बन गया, पर क्या हुआ?
पीछे गया, वह दशक पहले...।
आत्म चिंतन कर रहा होगा जरूर।
क्या मिला यूक्रेन को, कोई सुरक्षा
या गया वह उससे पहले, और पीछे...
क्या लिखेगा?
वक़्त! अपना... वाकिया! उस पेज.. पर,
आज से सदियों सज़र की
गुजर पर, सोचता हूं!
मै कुछ.. नहीं था,
आदमी.. था
आम.. था
क्या.. कहूं! किससे कहूं!
बस नाम का, मैं नागरिक था।
इसलिए मैं बैठकर, बाहर यहीं
इस पेड़ नीचे
चुप अकेला रो रहा हूं!
जय प्रकाश मिश्र
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