खिलेंगे… फूल, इन पर भी, समय… तो दो,
भाव: जीवन में संयम, विश्वास और समझ बहुत जरूरी है। हर चीज का समय होता है, हमे पहले ही उतावला नहीं होना चाहिए जब परिश्रम के पसीने से पूरे समय अपने भावना, इच्छा को सीचेंगे तभी सफल मिलेगे। याद रहे पूरे पतझड़ के बाद ही नई कोंपले आती हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
खिलेंगे… फूल, इन पर भी,
समय… तो दो,
पतझड़ है अभी, पत्ते इनके,
पूरे, झरने तो दो।
भाव: समाज में कुछ लोग बिना श्रम और त्याग के जीवन में लोगों का हिस्सा धोखे से, चालाकी से चोरी से पा लेते हैं वे बेशर्म हैं, बेहए ही हैं उनकी नकल न करें। ऐसे लोग आपको कभी कभी उच्च प्रतिष्ठित भी मिलेंगे पर एक सच है इनमें और आगे बढ़ने, बियासने की फैलने की क्षमता नहीं होती। ये और आगे नहीं बढ़ पाएंगे।भविष्य परिश्रमी का ही होगा।
वे.. जो हरे हरे हैं,
सालों साल
दिखते है तुम्हें, हरियाले,
जंगली है, बेहए हैं,
हया से दूर, बे-शर्म..बे-धर्म,
भयानक स्वार्थी हैं वे।
बैठे हों, कहीं भी, सब एक से हैं
नदिया के किनारे हों,
तालाब के बीचोबीच या
तेरे.. शहर… की उम्दा, शालीन
पोशीदा जगहों पर ही
क्यों न गद्दीनशीं हों।
पर परेशान न हो
ऊपर से, ये दिखते हों,
चाहे जितने हरे,
एक सच कहूं
भीतर इनके, एक भी
अंकुर होता ही, नहीं।
भाव: जिंदगी का अनुभव है कि कुछ लोग ही है जो जरूरत के लिए संयमित जीवन जीते है अधिकतम लोग एक नशे के वशीभूत हैं बस ज्यादा कमाओ, बचाओ, उड़ाओ, भोगों, और अंत में सब कर्मों पर प्रायश्चित करो। अनेक लोग लालच में, दुनिया की चौंध में गलत रास्तों पर चले जाते हैं। ये लोग अच्छे कमाने वाले स्वावलंबी भी होते हैं पर बूढ़े मां पिता के अनुरोध और सिखावन को नहीं मानते आखिर में अपने कर्मों पर पछताते ही हैं। और मां बाप की जीवन भर की तपस्या को अपने अभिमान के चलते मिट्टी में मिला देते है।
बहती रही, ये जिंदगी
और मैं…!
बैठ, देखता.. रहा,
अटूट! धार, इसकी।
बस, कुछ की, जरूरत थी ये,
बाकी की नशा थी,
जो खींचती थी, मिट जाने की,
हद तक इसको ।
रोकना तो चाहता था, मैं
उधर से न बहे!
इधर के, अच्छे, सच्चे, रास्तों
पे चले,
रास्ता वो ठीक नहीं,
पता था “उसको”
पर चमचमाता लोभ था,
बेताबी थी,
सब कुछ पा लेने की, कैसी
आपा धापी थी।
शार्टकट था,
सामने लहलहाते नमूने थे,
जवानी थी, रवानी थी, उम्मीद थी,
एक अजीब सी उन्वानी थी उसमें।
मैं वहीं था,
देखता सबकुछ
पर वह, सेल्फ डिपेंडेंट थी
रस्सियों में बांधता कैसे
कैसे खींचता उसको,
अब मुझमें शक्ति, उतनी न थी।
अरे! आंखे!
चौंधियां गईं उसकी,
उन चमकते, दमकते, खनकते
झूमते, बहते, दरिया की मौजों को देखते
लुभा.. गई, वो, छोड़ कर मुझको
मेरे जीवन की... सारी, मेहनत को।
जय प्रकाश मिश्र
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