आज उसकी भी होली है।

सभी को होली की शुभकामनाएं

भाव: त्योहार सभी के जीवन में समान उत्साह और उमंग भरते हैं। कम वेतन पाने वाले जरूर साखर्ची से काम नहीं कर सकते वे संयम और त्याग की भावना से जीवन जीते हैं। अनेकों बार अपनी जरूरतों में उन्हें समझौतावादी दृष्टिकोण  भी अपनाना पड़ता है। यही जीवन की रसमयता और भावअंकुरण को जगह भी देता है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

आज उसकी भी  "होली" थी

इसीलिए, 

सुबह सुबह, 

जल्दी ही उठी,

सभी घरों में काम पूरा करती

उतनी ही तेजी से त्योहारी 

भी इकठ्ठा की।

फिर ध्यान से याद किया!  

कोई घर, छूटा तो नहीं

सभी, घरों में "हो, ली" ? 


कुछ के यहां रंग, 

कुछ के यहां गुलाल बचे थे 

बीते साल के,

कुछ के यहां, मिठाइयां भी थीं

बची, रखी हुईं, अब तक प्यार से

पुरानी पिचकारियां भी थीं,  

सूखती, पिचकी हुईं 

चुनरी तो गजब की थी रंगीली,  

रंग, गुलाल, पिचकारी, मिठाइयां

और रंगीली चुनरी

उसे सब तो मिलीं

अब वो बहुत खुश थी..

आज उसकी भी, होली थी।


गुझिया.. चार सौ चालीस 

रुपए, किलो थी,

कई दुकानों पर, गई, दरयाफ्त की

वापस लौटी।

मंहगाई बहुत है, कहती हुई,

निढाल हो, सरे बाजार वो बैठ ही गई।


करे क्या!  

जोड़ने लगी, हाथों की उंगलियों पर

गुझिया की जरूरत और 

बाजार की सच्चाई, 

दोनों को तौलते हुए बोली..

कितनी चाहिए उसे? 

हां पंद्रह से मन जाएगी, 

इसबार की होली

खुश हो, एक बार फिर गिनने लगी।


एक किलो से अब

आधा किलो पर उतर आई!  

जब तौलाई, 

तो बस

दो गुझिया कम पढ़ने लगीं।

चलो अबकी, मै नहीं खाउंगी, 

सोच कर, संकल्पित हो 

उत्साह भर 

आधा किलो गुझिया की पन्नी 

हाथों में झुलाती 

प्रफुल्लित हो, 

घर की तरफ चल दी।

आखिर आज उसकी भी, होली थी।

जय प्रकाश मिश्र


 




Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!